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description=भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।;

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टूटीं कितना नुकसान हुआ उसके लिये कौन बाहर निकलता बिजली तो आँधी शुरू होते ही कट गई थी पर सोलर पैनल काम कर रहा था वाई फ़ाई का टॉवर तड़ित बिजली से फुँक न जाये मैंने उसकी बिजली काट दी अपने आप को घर की दीवारों में समेट लिया आधा घंटे बाद हवा का ज़ोर कम हुआ पर तब भी बाहर निकलने लायक नहीं था लेकिन तीन लोग हमारे दरवाज़े पर खड़े थे मोनू भी उनमें था मुँह में पान मसाला दबाये निस्पृह भाव से इजाज़त माँगने में अनुनय कम था औपचारिकता ज़्यादा जैसे यह तो होना ही था बस एक खानापूर्ति थी वे परिसर में गिरे नीम और गूलर की शाखाएँ घसीट ले जाना चाहते थे इन डालों की पत्तियाँ उनकी बकरियों के चारे और डालें उनके चूल्हे के ईंधन का काम करने वाली थीं मैं देख रहा था यह व्यवहार मुझे अजीब लग रहा था न निंदा थी मन में न सहानुभूति की लहर बस एक अचरज कि यह आदमी अभी यहाँ है इस काम में इस तरह अगले दिन सुबह पढ़ा आँधी में 117 लोग मारे गये थे पास 10 किलोमीटर दूर उगापुर में 7 लोग गिरे पेड़ के नीचे दब कर खतम हो गये ये वे आँकड़े हैं जो दर्ज हुए होंगे यहाँ बहुत कुछ दर्ज होता ही नहीं मुझे पड़ोस की वे औरतें याद आती हैं जो तेज़ आँधी में आम बीन रही थीं मोनू याद आता है और मैं सोचता हूँ यह व्यवहार आता कहाँ से है जो दो कच्चे आम के लिये जान की फ़िक्र नहीं करता जवाब मेरे पास नहीं है पर इतना ज़रूर लगता है जो आम बीन रहे थे वे पागल नहीं थे उनकी दुनिया में कल अनिश्चित है इसलिए अभी ज़रूरी है जोखिम उनके लिए कोई नई चीज़ नहीं वह तो हमेशा से हवा की तरह है दिखता नहीं पर रहता है मैंने दरवाज़ा बंद किया था उनके पास दरवाज़ा था ψψψ share साझा करें print opens in new window print share on facebook opens in new window facebook share on x opens in new window x share on telegram opens in new window telegram share on tumblr opens in new window tumblr email a link to a friend opens in new window email share on linkedin opens in new window linkedin share on pinterest opens in new window pinterest share on whatsapp opens in new window whatsapp share on reddit opens in new window reddit like loading posted by gyan dutt pandey 15 05 2026 15 05 2026 posted in 2nd inning गांवदेहात ग्रामचरित्र ग्राम्यजीवन vikrampur village characters village diary village life tags village diary 3 comments on आँधी आम और डालें नर्मदा दंड परिक्रमा अध्याय 1 बलिया पेसेंजर से बरगी के ड्रेगन तक अप्रेल 2026 यात्रा का पहला महीना यात्रा का प्रारम्भ कटका स्टेशन पैसेंजर ट्रेन में गुजरते प्रेमसागर कटका स्टेशन पर गुजरते प्रेमसागर सवेरे फोन आया तो प्रेमसागर की ट्रेन बनारस सिटी में खड़ी थी उन्होंने बताया कि वे प्रयाग जा रहे हैं वहाँ से चित्रकूट जाएंगे किसी चंदन की लकड़ी का आठ इंच का टुकड़ा लेकर आगे निकलेंगे नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये मेरे हिसाब से यह शुद्ध हठयोग है इससे साधक की आत्मिक उन्नति कितनी होती है वही जाने पर धर्म में इस तरह के प्रयोगों की परम्परा है प्रेमसागर की इस यात्रा के माध्यम से मैं अपनी मानसिक हलचल ही दर्ज करूँगा उसमें मेरी एक तरह की आर्मचेयर नर्मदा यात्रा होगी जहाँ मैं चल नहीं रहा पर भीतर बहुत कुछ चल रहा है पत्नीजी से अनुरोध किया कि प्रेमसागर के लिये एक कैसरोल में पूरी तरकारी बना दें वह तैयार हो गया पर ट्रेन लेट होती गई जब गाड़ी कटका स्टेशन पर आई तो बारह बज चुके थे बहुत सालों बाद मैं प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर गया जबकि स्टेशन घर से मात्र पाँच सौ कदम की दूरी पर है प्रेमसागर का डिब्बा अंतिम था तो पूरी लम्बाई चलकर वहाँ पहुँचा दो मिनट ही रुकी होगी गाड़ी प्रेमसागर बाहर निकल कर दौड़ते हुए मेरे पास आये और चरण स्पर्श किया भोजन का कैसरोल मेरे ड्राइवर अशोक ने उन्हें थमाया और ट्रेन चल दी जाती ट्रेन के दरवाजे पर खड़े प्रेमसागर का चित्र मैंने खींचा सफेद कपड़ा पहने प्रेमसागर में मेरे प्रति आदर भाव साफ दिख रहा था आगे की कठिन यात्रा को लेकर कोई तनाव कोई उहापोह लेशमात्र भी नहीं उनके गुणसूत्र में यायावरी है यायावरी उनका ओढ़ना बिछौना है उनकी साँसों में बसी हुई है लगता है नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये वे वैसे ही निकले हैं जैसे मैं साइकिल लेकर गंगा किनारे टहलने निकलता हूँ पर यायावरी को मैं किसी अद्भुत तपस्या से नहीं जोड़ता मेरी राय में वह कठिन जरूर है उसमें संघर्ष है पर अंततः वह एक साधारण मानवीय प्रवृत्ति ही है हर आदमी कुछ न कुछ मात्रा में यायावर है प्रेमसागर बस थोड़ा ज्यादा है दंड नर्मदा यात्रा का विवरण लिखते हुए मैं प्रेमसागर को महानता के चने के झाड़ पर नहीं चढ़ाऊंगा वे नर्मदा को समझें तो ठीक नर्मदा के किनारे किनारे चलते हुए भी अगर अछूते निकल जायें तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा मेरी अपनी मानसिक यात्रा चलती रहनी चाहिये बस सूर्यकुंड से बंजार संगम परिक्रमा का पहला दिन 04 अप्रेल 2026 उसके बाद प्रेमसागर का फोन बंद रहा आज 4 अप्रेल को सवेरे मंडला से फोन आया चित्रकूट से उन्होंने सवा बित्ते की चंदन की लकड़ी ले ली है आज सवेरे वे नर्मदा स्नान कर केवल एक धोती के अधोवस्त्र में कमर पर गमछे का फेंटा लपेटे एक कमंडल में पीने के लिये जल लेकर दंड परिक्रमा प्रारम्भ करने जा रहे हैं मंडला में नर्मदा के दक्षिण तट से प्रेमसागर ने दंड परिक्रमा प्रारम्भ की शुरुआत सूर्यकुंड से हुई दक्षिणमुखी हनुमान जी को प्रणाम कर दंड यात्रा का अर्थ है बार बार सड़क पर लेटना उठना और आगे बढ़ना एक किलोमीटर में लगभग 1670 कदम या 560 दंडवत गंगा किनारे सुल्तानगंज से बैजनाथधाम की दंड कांवड़ यात्रा का अनुभव उनके पास पहले से है लेकिन यह नर्मदा दंड परिक्रमा उससे कहीं बड़ी है करीब छब्बीस गुना बड़ी पूरी नर्मदा परिक्रमा दंडवत लगभग सोलह लाख बार शरीर को धरती पर टिकाना और उठाना बिना किसी साथ निभाते सहायक के सोलह लाख संख्या सुनने में ही भारी लगती है आज की तय की गई दूरी मात्र दो किलोमीटर रही शुरुआत थी इसलिए शरीर और मन दोनों को लय पकड़नी है धीरे धीरे पाँच किलोमीटर प्रतिदिन का औसत बन जाएगा ऐसा अनुमान है कुल मिलाकर डेढ़ साल का समय इस यात्रा में लगेगा मैं सोचता हूँ अगर इस यात्रा के साथ लिखना हो तो क्या लिखा जाए शायद रास्ते में मिलने वाले लोगों के बारे में जो सहयोग करते हैं जो रास्ता दिखाते हैं जो पानी देते हैं जो चुपचाप देखते हैं उनके बारे में लगभग पाँच सौ लोगों की कथाएँ नर्मदा के लोग शायद यही इस यात्रा का असली लेखा जोखा होगा आज सूर्यकुंड से बंजार नर्मदा संगम तक की यात्रा हुई दो जगह लोगों ने प्रेमसागर को अतिथि की तरह रखा मंडला में नर्मदा के उत्तर तट पर अंकित जी और उनकी धर्मपत्नी ने और सतवार गाँव के देवचंद कुशवाहा ने आज रात में ये दोनों परिवार एक साथ थे प्रेमसागर के साथ दंड परिक्रमा से जुड़ते लोग रींवा के स्वामीदीन पाण्डेय की बिटिया प्रियंका और उनके पति अंकित मंडला में रहते हैं स्वामीदीन जी ने उन्हें कहा था कि प्रेमसागर का ध्यान रखें बात कहने भर की थी पर उन्होंने उसे जिम्मेदारी की तरह लिया घर बुलाया सत्कार किया और अब जहाँ भी प्रेमसागर रात में रुकते हैं वहाँ पहुँच जाते हैं प्रेमसागर इस बात पर अटक जाते हैं भईया मंडला पहुँचा तो बस डेढ़ घंटा लेट थी ये लोग कोंरा में बच्चा लिये खड़े रहे मेरे इंतजार में रास्ते में लोग दंड यात्रा देखते हैं तो अपने अपने घरों से बाहर निकल आते हैं अजूबा लगता है उन्हें यह चलना एक आदमी ने कहा बाबाजी आप जैसे परकम्मावासी हों तो कितना अच्छा हो पर इसी रास्ते में एक दूसरा दृश्य भी है गाँव वालों ने बताया एक यात्री ने गुस्से में एक बच्चे के पैर पर लाठी दे मारी थी यात्रा पर निकलना आसान है अपने राग द्वेष क्रोध उन्हें छोड़ना शायद उतना आसान नहीं सूरजकुंड से गुरुम कुशवाहा साथ हो लिये हैं पचास पचपन के होंगे तीन बेटे हैं पत्नी ने बिना झिझक उन्हें परिक्रमा के लिए भेज दिया फोन पर गुरुम से मेरी बात हुई तो बोले एक लड़के को बिजली का करंट लग गया था अब ठीक है नर्मदा माई की कृपा से वही अब अपने भाई के साथ पुट्टी लगाने के काम में जाने लगा है यह यात्रा माई के प्रति आभार है उनके दो पड़ोसी साइकिल से निकले हैं रोज पचास किलोमीटर चलने की ठान कर गुरुम कहते हैं इतना हमसे नहीं होगा बाबाजी के साथ धीरे धीरे चलेंगे उनके लिए पानी ले चलेंगे साथ में परिक्रमा हो जाएगी दो दिन से वन विभाग के एसडीओ मौर्या साहब भी मिल रहे हैं बोले जितना हो सकेगा सहायता करेंगे धीरे धीरे लोग जुड़ते जा रहे हैं अगर कृपा बनी रही तो यह यात्रा सिर्फ प्रेमसागर की नहीं रहेगी कई लोगों की साझी यात्रा बन जाएगी छाले और जेठ की जलन 22 अप्रेल 2026 नियमित लिखना नहीं हो रहा पर प्रेमसागर फोन कर या व्हाट्सऐप कर बता देते हैं अपनी दंड यात्रा का हाल घाघा से आगे निकल चुके हैं सहस्रधारा पीछे छूट गई है दो रोज पहले घोघा में नोतमदास बैरागी जी के यहाँ रहे थे बैरागी जी ने सवेरे साढ़े पाँच बजे उषाकाल में प्रेमसागर के दंड शुरू करते का वीडियो बना भेजा था उस वीडियो को देखकर ही अंदाज हो जाता है इस पूरे कार्य की कठिनाई का वीडियो में प्रेमसागर पिछली शाम के बनाए चिन्ह की मिट्टी को समतल करते हैं अपना फेंटा बाँधकर कान पकड़ तीन बार उठक बैठक लगाते हैं शायद नर्मदा माई से भूल चूक के लिये क्षमा याचना के प्रतीक के रूप में उसके बाद उनका बैठने लेटने चिन्ह लगाने और उठ कर चिन्ह तक आगे बढ़ने का क्रम प्रारम्भ होता है पास में कोई मंदिर है जिस पर मानस की चौपाई का पाठ हो रहा है लाउडस्पीकर पर सवेरे का समय और दंड भरते प्रेमसागर धर्म के प्रति श्रद्धा भी जगती है और यह प्रश्न भी कि काहे यह कर रहे हैं वे क्या कोई और तरीका नहीं है आध्यात्मिकता का यह अपनी मन की सारंगी के तार कुछ ज्यादा कसना नहीं है इतना कसना कि जीवन संगीत ही अलग सा हो जाए क्या इसमें यात्रा की सरलता है या कठिन यात्रा का अभिमान वे मुझे बताते हैं भईया कार से चलते लोग भी रुककर पानी पिलाते हैं कोई तो डाभ भी ले आते हैं पिलाने के लिये गर्मी बहुत पड़ रही है सड़क का डामर इतना गरम हो जाता है कि 9 10 बजे रुकना पड़ता है रोज 4 5 किलोमीटर दंड भरा जा रहा है हाथों सीने और पेट पर छाले पड़ जा रहे हैं छाले फूट भी जाते हैं बोरो प्लस पास में है छालों पर लगाने को भईया अभी तो सड़क किनारे पेड़ नहीं हैं पर डिप्टी साहब बता रहे हैं आगे सागौन के जंगल मिलेंगे तो छाया रहेगी छाया में दूरी ज्यादा तय हो पाएगी मैंने सोचा था कि घाघा के बैरागी जी से फोन पर बात करूँगा पर वह हो नहीं पाया यात्रा के लोगों से जुड़ने का अर्थ है रोज प्रेमसागर के लिये 3 4 घंटे का समय निकाल कर जानकारी संजोना और लिखना उसका न साहस बन रहा है न अनुशासन प्रेमसागर एक विलक्षण यात्रा कर रहे हैं तीन सप्ताह हो रहे हैं यात्रा को वे मान कर चल रहे हैं कि मैं उनके साथ हूँ वर्चुअल तरीके से ही सही वे मेरी झिझक को सहमति मान कर चल रहे हैं मैं अभी इस गुणा भाग में लगा हूँ कि क्या मैं कोई एक लाख शब्द का दस्तावेज रूखी रिपोर्ट नहीं पठनीय लेखन लिख पाऊँगा मुझे अभी अपने पर भरोसा नहीं है सतपुड़ा का जंगल और महुआ की छाँह 24 अप्रेल 2026 प्रेमसागर जी ने सवा दस बजे फोन किया सतपुड़ा के जंगल से सागौन के पेड़ों पर पत्ते नहीं हैं सड़क धूप में भभकने लगती है दस बजे तक दंड परिक्रमा रोककर एक महुआ की छाया में गमछा बिछाया है शाम चार बजे तक यहीं विश्राम होगा महुआ में पत्ते हैं और नए भी आए हैं टपक भी रहा है महुआ नर्मदा जी दो किलोमीटर दूर होंगी पर जंगल से कोई एहसास नहीं होता प्रेमसागर के कहने से भवानी प्रसाद मिश्र की कविता याद आती है सतपुड़ा के घने जंगल दंड यात्रा चल रही है कोई जंगली सूअर कहीं खुरखुरा रहा होगा एक और बात बताई प्रेमसागर जी ने नर्मदा दंड परिक्रमा करने वाले को सोना भी जमीन पर पड़ता है पिछली रात ठाडा गाँव में ओसारे में जमीन पर बिस्तर बिछाया था गृहस्वामी और उसका परिवार साथ था घर कोई बहुत संपन्न का नहीं दिखता पर है साफ सुथरा और सलीकेदार पहले हल बैल गाड़ी होते अब मोटर साइकिल है मैं तो कल्पना ही कर सकता हूँ कि बाबाजी को भोजन में क्या मिला होगा मड़ुआ की रोटी और कोदों का भात या अब गाँव भी गेहूँ धान पर आ गया होगा मन मेरा ललचाता है आखिर यात्रा तो प्रेमसागर ही कर रहे हैं अकेले उमेश यादव का पपीता और मूंग के खेत 25 अप्रेल 2026 नर्मदा दंड परिक्रमा करते प्रेमसागर के प्रति अनुराग रखने वाले सहायक लोग मिलते और जुड़ते हैं जहाँ तक हो सकता है चले आते हैं अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार श्रद्धा पता नहीं धर्म पर होती है या मानवता पर प्रेमसागर पर या नर्मदा पर पर है प्रचुर अहमदपुर के उमेश यादव जी दंड यात्रा से जुड़े आते हैं कभी पानी की बोतलें लिए कभी पपीता अनजान लोग भी रुकते हैं हाल पूछते हैं और पानी नारियल देते हैं दंड यात्रा में कष्ट ही नहीं है मिलने वाले लोगों के व्यवहार की तरावट भी है बाईस दिन हुए हैं दंड परिक्रमा को अभी तो शुरुआत ही मानी जाए 26 अप्रेल 2026 आज का पड़ाव प्रेमसागर बताते हैं साल्ले डंडा कहते हैं इस नाम की नदी भी है सूखी हुई बरसाती नदी है यहाँ के पूर्व सरपंच ज्ञानी लाल जी के यहाँ दोपहर का विश्राम हुआ और शाम को दंड भरने के बाद रात भी वहीं रहेंगे गाँव में कच्चे पक्के दोनों तरह के घर हैं किसान गेहूँ काट चुके हैं कुछ मूंग की भी फसल ले लेते हैं धान की खेती से पहले कोदों नहीं होता यहाँ बगल के ब्लॉक में लोग बता रहे थे कि इस दफा राशन में सरकार ने कुटकी बाँटा है आज से तीस साल पहले मंडला के परिक्रमा विवरणों में कुटकी कोदों साँवा जैसे मोटे अनाज का जिक्र है भोजन में भी उन्हीं का इस्तेमाल वह सब अब नहीं है प्रेमसागर बताते हैं खेती हल बैल से भी होती है और ट्रेक्टर से भी बैलगाड़ियाँ भी दिखती हैं इलाका पारम्परिक और मशीनी खेती की संधि पर है कल बैलगाड़ी का फोटो लेने की कोशिश करूँगा भईया पलाश और सोलर कुकर की उपमा 27 अप्रेल 2026 नर्मदा दंड परिक्रमा प्रेशर कुकर की रसोई नहीं है धीमी आँच पर बनती खिचड़ी की तरह है स्वाद धीरे धीरे घुलता है अन्न में कुछ उस तरह पर आजकल तो सूरज तप रहे हैं रसोई की उपमा सोलर कुकर से करनी चाहिए साढ़े पाँच बजे शुरू की परिक्रमा नौ बजे तक थामने का समय हो जाता है पहली पारी की खिचड़ी नर्मदा परिक्रमा मार्ग बन रहा है गर्दा उड़ रहा है श्रमिक कहते हैं यहीं पेड़ की छाँह में आराम करो बाबा प्रेमसागर कहते हैं अब चार बजे शाम को शुरू करूँगा एक किलोमीटर बचा है घाटी पार करने में वैसे भईया यह कच्ची पगडंडी बेहतर है दंड यात्रा के लिये पक्की सड़क पर तो डामर ज्यादा ताप देता है उमेश यादव फिर आये आज पत्नी लक्ष्मी और छोटी बेटी को भी साथ ले आये बेटी के हाथ में पानी की बोतल है शायद उसी को सौंपने की जिम्मेदारी दी गई है बड़ी बेटी प्रियंका घर पर रही पर पपीते भेजे 40 डिग्री के जंगल में यह परिवार नर्मदा माई की सेवा में अपनी तरफ से जंगल की ओर नजर डाली जाये महुआ भी टपक रहा है पलाश भी फूला है मानो जंगल बिना आग दहक रहा हो बस सागौन खँखड़ हो गया है आठ आठ फुट की दूरी पर लगाए सागौन के पेड़ बल्लियों की तरह ठूँठे खड़े हैं कल का आतिथ्य देने वाले साल्ले डंडा के ज्ञानी लाल वर्कड़े जी का चित्र मोबाइल से प्रेमसागर भेजते हैं पाँव खाट पर फैलाए बैठे ज्ञानी लाल जी ज्ञानी लाल जी जैसे सैकड़ों हजारों मिलेंगे जिनकी सहायता से प्रेमसागर की दंड यात्रा पूरी होगी जंगल का बीहड़ रास्ता और वेगड़ जी की स्मृति 28 अप्रेल 2026 यह भी कोई रास्ता है जो चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं उनमें जंगल के पेड़ों के बीच जगह भर नजर आती है कंकड़ पत्थर वाली जगह कोई दूब नहीं कोई सभ्यता का निशान नहीं पानी भी नहीं मात्र धूसर रंग चरवाहों ने बनाया होगा दो जगहों के बीच कौआ उड़ान की दूरी जो परिक्रमावासी हर इंच बचाते हैं जंगल से नहीं डरते वे यही चुनते हैं प्रेमसागर भी इसी पर दंड भर रहे हैं कंकर पत्थर है पर डामर नहीं दहकता जब तक यह गर्मी है यह बीहड़ रास्ता उस अलकतरे वाली सड़क से बेहतर है सूखी पत्तियाँ पग खुद रास्ता गढ़े जंगल सहमत कंकर की चुभन देह नापे हर इंच मौन परिक्रमा दंडवत देह डामर से ठंडी मिट्टी यात्रा भीतर की सन् 1977 में वेगड़ जी ने नर्मदा यात्रा की तब बरगी बाँध नहीं था नर्मदा से निकटता और आत्मीयता दोनों रही होगी तब अब तो वेगड़ जी भी नहीं रहे बरगी बाँध बना हजारों एकड़ जंगल डूबे गाँव डूबे लोग उजड़े नर्मदा का स्वभाव बदला जो oral history थी बुजुर्गों की स्मृति में उनकी भाषा में वह भी धीरे धीरे डूब गई अब न वे लोग हैं न वे किनारे न वह नर्मदा नक्शे में देखता हूँ तो बरगी का जलभराव ड्रेगन जैसा दिखता है कहीं मोटा कहीं पतला कहीं पतली पतली पूँछ जैसा नक्शे में देखता हूँ तो बरगी का जलभराव ड्रेगन जैसा दिखता है कहीं मोटा कहीं पतला कहीं पतली पतली पूँछ जैसा प्र...
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