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पीडि़त पात्रों को अपना शिकार बनाते हैं आलम्बन के रूप में वर्तमान व्यवस्था या उसके पात्रों के धर्म अर्थात् आचरण को देखकर या अनुभव कर दुखी शोषित त्रस्त पात्र जब अपने मन में लगातार त्रासदियों को झेलते हुए यह विचार लाने लगते हैं कि वर्तमान व्यवस्था बड़ी ही बेरहम अलोकतांत्रिक और गरीबों का खून चूसने वाली व्यवस्था है तो यह विचार अपनी ऊर्जस्व अवस्था में अपने चरमोत्कर्ष पर आक्रोश को जन्म देता है विभिन्न प्रकार की वैचारिक प्रक्रियाओं से गुजरकर बना यह स्थायी भाव ही विरोध को रस की परिपक्व अवस्था तक ले जाता है उत्तर प्रदेश की हरिजन कन्या हो या महाभारत की द्रौपदी दोनों में से किसी का अपमान देखने वाला चाहे वह भीष्म पितामह हो या गुरु द्रोणाचार्य या चरणसिंह मेरे लिये धृतराष्ट्र ही हैं विरोध शीर्षक से साहित्यिक पत्रिका काव्या के अप्रैल जून 90 सं हस्तीमल हस्ती में प्रकाशित श्री विश्वनाथ की उक्त कविता का यदि हम रसात्मक विवेचन करें तो इस कविता में उत्तर प्रदेश की हरिजन कन्या या महाभारत में हुए द्रौपदी के अपमान को सुनकर देखकर या अनुभव कर आश्रय रूपी कवि का मन मात्र ऐसे धृतराष्ट्रों के प्रति ही आक्रोश से सिक्त नहीं होता जो आंखों से अंधे हैं उसके मन में ऐसी वैचारिक ऊर्जा सघन होती है जो भीष्म पितामह से लेकर गुरु द्रोणाचार्य यहां तक कि किसान नेता चरणसिंह के प्रति भी आक्रोश को जन्म देती है कारण कवि के मन में यह विचार कहीं न कहीं ऊर्जस्व अवस्था में है कि धृतराष्ट्र की तरह ही सब के सब नारी अपमान के प्रति आंखें मूदे रहे हैं नारी अपमान को अनदेखा करने का यह विचार कवि को जिस आक्रोश से सिक्त कर रहा है यह आक्रोश ही विरोधरस का वह परिपाक है जिसकी रसात्मकता आत्मीयकरण की स्थिति में सुधी पाठकों को आक्रोश से सिक्त कर धृतराष्ट्रों के विरोध की और ले जायेगी 2 विद्रोह रस विरोधरस का मूल आलम्बन भी व्यवस्था और उसके वह पात्र होते हैं जो शोषित दलित पात्रों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते उनकी सुविधाओं पर ध्यान नहीं देते परिणामतः मेहनतकश दलित शोषित वर्ग में असंतोष के ज्वालामुखी सुलगने लगते हैं असंतोष विद्रोह रस का स्थायी भाव है इसके संचारी भावों में दुख अशांति क्षोभ आक्रोश खिन्नता उदासी आदि माने जा सकते हैं इस रस के मुख्य अनुभाव अवज्ञा ललकार चुनौती फटकार आदि हैं तुहमतें मेरे न सर पर दीजिए झुक न पायेगा कलम कर दीजिए सत्य के प्रति और भी होंगे मुखर आप कितने भी हमें डर दीजिए वर्ष 1988 में प्रकाशित दर्शन बेजार के तेवरी संग्रह दे श खंडित हो न जाए की उपरोक्त तेवरी का यदि रसात्मक विवेचन करें तो सत्य और ईमानदारी की राह पर चलने वाले एक सच्चे इन्सान की यह व्यवस्था उसे इस मार्ग को डिगाने के लिये मात्र डराती धमकाती ही नहीं उसका खात्मा भी कर देने चाहती है ऐसी स्थिति में वह ऐसी घिनौनी व्यवस्था से कोई समझौता कर संतोष या चैन के साथ चुप नहीं बैठ जाता बल्कि संघर्ष करता है उसे ललकारता है कुल मिलाकर उसके मन में व्यवस्थापकों के प्रति ऐसा असंतोष जन्म लेता है जो खुलकर विद्रोह में फूट पड़ता है भले ही उसका सर कलम हो जाये लेकिन वह कह उठता है कि सत्य के प्रति ऐसे हालातों में मुखरता और बढ़ेगी व्यवस्थापकों के प्रति असंतोष से जन्य यह अवज्ञा और चुनौती से भरी स्थिति विद्रोह का ही रस परिपाक है नवें दशक की कविता को समझने के लिये आवश्यक है कि हम निम्न तथ्यों को भी समझने का प्रयास करें कि भाव विचार से जन्य ऊर्जा ही होते हैं यदि कवि के मन में यह विचार न आया होता कि उत्तर प्रदेश में हरिजन कन्या के साथ अत्याचार हुआ है और महाभारत काल में द्रौपदी का अपमान तो उसके मन में आक्रोश का निर्माण किसी प्रकार सम्भव न था दूसरी तरफ वह निर्णय न लेता कि नारी अपमान को अनदेखा करने वाले भी अंधे घृतराष्ट्र से कम अपराधी नहीं होते तभी तो वह भीष्म पितामह द्रोणाचार्य या राजनेता चरणसिंह को धृतराष्ट्र की श्रेणी में रखता है उपरोक्त विवेचन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रस की निष्पत्ति आलम्बन से नहीं आलम्बन के धर्म से होती है यदि द्रोणाचार्य भीष्म पितामह या चरण सिंह ने नारी अपमान के प्रति अपना विरोध प्रकट किया होता या धृतराष्ट्र के नारी अपमान न होने दिया होता तो कवि के मन में आक्रोश की जगह इन्हीं पात्रों के प्रति श्रद्धा जाग उठती काव्य का सम्बन्ध जब दर्शक पाठक या श्रोता से जुड़ता है तो यह कोई आवश्यक नहीं कि उसमें उसी प्रकार के रस की निष्पत्ति हो जो काव्य के पात्रों में या काव्य में अन्तर्निहित है इसके लिये जरूरी है कि पाठक दर्शक श्रोता का आत्म भी ठीक उसी प्रकार का हो जो कवि की आत्माभिव्यक्ति से मेल खाता है इसी कारण मैं काव्य में साधारणीकरण नहीं आत्मीयकरण की सार्थकता को ज्यादा सारगर्भित मानता हूं यह आत्मीयकरण के कारण ही है कि तुलसी के काव्य के प्रति सारी सहृदयता को उड़लने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आचार्य केशव के प्रति इतने हृदयहीन क्यों हो जाते हैं कि उन्हें काव्य का प्रेत कह डालते हैं जबकि डॉ विजयपाल सिंह में केशव के प्रति कथित सहृदयता का तत्त्व साफ साफ झलकता है इसलिये नवें दशक की कविता को रसाभास का शिकार बनाने से पूर्व इसमें अन्तर्निहित इन दो नये रसों के साथ साथ हमें साधारणीकरण के मापकों को त्यागकर आत्मीयकरण का नया मापक लेना ही पड़ेगा तभी नवें दशक की कविता का रसात्मक आकलन हो सकता है रमेशराज 15 109 ईसानगर अलीगढ़ 202001 मो 9634551630 posted by रमेशराज तेवरीकार at 7 25 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest friday june 24 2016 काव्य की आत्मा और रस रमेशराज rameshraj काव्य की आत्मा और रस रमेशराज आचार्य भरतमुनि रस के प्रवर्त्तक माने जाते हैं उन्होंने रस को नाटक का अनिवार्य धर्म के रूप में स्वीकारा है भाव संचारी भाव अनुभाव और स्थायी भाव के सहारे स्थापित की गयी इस रस की सत्ता को आगे आने वाले रस आचार्यों ने भी स्वीकार करते हुए रस को काव्य का एक अनिवार्य और सर्वोपरि प्रयोजन माना तथा रस के बारे में कहा कि रस के सम्पर्क से प्रचलित अर्थ उस प्रकार आभासित होने लगते हैं जिस प्रकार वसंत सम्पर्क में द्रुम दृष्टपूर्वा अपि ह्यार्था काव्ये रस परिग्रहात सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमाः 1 आनन्दवर्धन मम्मट कुंतक आदि रस के बारे में निष्कर्ष यह रहा है कि 1 रस काव्य का अमृत एवं अन्तस् चमत्कार का वितानक होता है 2 2 रस काव्य का सर्वोपरि प्रयोजन है 3 3 रस सब अलंकारों का जीवित रसवत् अलंकार है 4 महिमभट्ट एवं आचार्य विश्वनाथ ने अपने पूर्ववर्त्ती एवं सम्वर्त्ती आचार्यो के मतों के अनुसार एवं अपने तर्कों के सहारे रस को काव्य की आत्मा घोषित करते हुए अपने अभिमत इस प्रकार प्रस्तुत किए काव्य स्यात्मिन संगिनि रसादिरूपे न कस्यचिद विभति अथवा वाक्यं रसात्मक काव्यं काव्य में रस की स्थिति या अस्तित्व के बारे में दिए गये उक्त तथ्यों के आधार पर रस को ही काव्य की आत्मा मान लेने में ऐसी अनेक दिक्कतें हैं जिनका समाधान आवश्यक है 1 यदि रस काव्य का अनिवार्य एवं सर्वोपरि प्रयोजन ही है तो सामाजिकों को रस तो अश्लील गैर साहित्यिक फूहड़ और विकृत कृतियों में भी आता है तब इस प्रकार की रस व्याख्याओं के आधार पर क्या काव्य की आत्मा के सत् रूप के जीवंत बनाये रखा जा सकता है इस तरह काव्य की आत्मा भी विकृत और अश्लील नहीं हो जाएगी 2 यदि रस के सम्पर्क से ही प्रचलित अर्थ ठीक उसी प्रकार आभासित जिस प्रकार वसंत के सम्पर्क में द्रुम तब काव्य के आस्वादक के रूप में एक कथित सहृदय की आचार्यों ने किसलिए खोज की यदि रस में ही इतनी शक्ति या प्रभावोत्पकता है तो एक ही काव्य सामग्री के प्रति विभिन्न आस्वादक रससिक्त होने के साथ साथ रसहीनता की ओर क्यों जाते हैं बिहारी का काव्य मार्क्सवादियों को फीका क्यों महसूस होता है आचार्य शुक्ल केशव को काव्य का प्रेत क्यों बताने लगते हैं सच तो यह है रस का अमृत अन्तस् चमत्कार का वितानक एवं सर्वोपरि प्रयोजन तभी जान पड़ता है जबकि जिस काव्य सामग्री का हम आस्वादन कर रहे होते हैं वह आस्वादन सामग्री हमारे रागात्मक मूल्यों से मेल खाती महसूस होती हो अर्थात् जब काव्य सामग्री में व्यक्त किये गये रागात्मक मूल्य हमारे रागात्मक मूल्यों से मेल खाते अनुभव तभी काव्य से ग्रहण किया गया रागात्मक अर्थ इस प्रकार आलोकित होता है जैसे वसंत के सम्पर्क में द्रुम एक नारी भोग में लिप्त में लिप्त रहने वाले सामाजिक को ऐसे काव्य से ही रस या आनन्द की प्राप्ति हो सकती है जो वासना आलिंगन चुम्बन विहँसन आदि का ब्यौरेबार बिम्ब प्रस्तुत करता हो जबकि नारी भोगविलास को व्यभिचार की श्रेणी में रखने वाले आस्वादक को ऐसी रसात्मकता शायद ही प्राप्त हो जो एक कथित रसिक को आनन्दित करती है इन दोनों अवस्थाओं का सम्बन्ध हमारे उन रागात्मक मूल्यों से है जिनके द्वारा हमारे आत्म अर्थात् रागात्मक चेतना का निर्माण होता है और जिन्हें हम काव्य में सीधे सीधे देखना या अनुभव करना चाहते हैं रस को ही अन्तस् चमत्कार का वितानक और काव्य का सर्वोपरि प्रयोजन मानने से पूर्व हमें यह अवश्य सोचना पड़ेगा कि क्या हम नारी के रूप में माँ बहिन बेटी आदि के साथ वही रसात्मकबोध या आनन्दावस्था ग्रहण नहीं कर सकते जो कि एक प्रेमिका या पत्नी के साथ सम्भव है हमारे विचार से नहीं इसका मूल कारण हमारी रागात्मक चेतना की वह मूल्यवत्ता अवश्य है जो आत्म के रूप में विभिन्न प्रकार के सम्बन्धों के प्रति विभिन्न के व्यवहार करती है यही विभिन्न प्रकार की रागात्मक दृष्टियाँ काव्य से लेकर लोक जीवन के रसात्मकबोध को भिन्न भिन्न तरीके से भिन्न भिन्न अवस्थाओं में आलोकित करती है अतः काव्य की आत्मा रस सिद्ध करने से पूर्व हमें इस बिंदु पर आकर अवश्य विचार करना पड़ेगा कि काव्य का सम्पूर्ण क्षेत्र हमारा समाज या लोक के प्रति रागात्मक सम्बन्धों का क्षेत्र है जिसमें विभिन्न प्रकार की रागात्मक चेतना शक्ति या दृष्टि ही हमें विभिन्न प्रकार के रसात्मक बोधों की ओर ले जाती है रति को ही लीजिये इसके द्वारा शृंगार रस की निष्पत्ति होती है यदि हम इसका सूक्ष्म विवेचन करें तो रति वात्सल्य भक्ति करुणा के मूल में भी रहती है लेकिन इन सब के रसात्मक बोध में अंतर उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका हमारी रागात्मक चेतना या दृष्टि ही होती है यदि नायक नायिका शारीरिक भोग के प्रति आकर्षित होने वाले प्राणी हैं तो उनके मन में उत्पन्न होने वाली रति शृंगार का आधार बनेगी यदि नायक नायिका समाज या एक दूसरे के प्रति दुःख दर्दों में हिस्सेदारी तय करने वाले प्रेमी हैं तो दोनों में उद्बुद्ध रति करुणा के चरमोत्कर्ष को दर्शाएगी ठीक इसी प्रकार यदि माँ बेटी या बेटे की सुखात्मक अनुभूतियों से सिक्त हैं तो इन सम्बन्धों के बीच उद्बुद्ध रति का चरमोत्कर्ष ममत्व और वात्सल्य में अनुभावित होगा स्वामी और सेवक के बीच के रागात्मक सम्बन्ध रति को भक्ति या दास के रूप में आलोकित करेंगे भाई भाई बहिन भाई आदि के रागात्मक सम्बन्धों की रति भी किसी न किसी रसात्मक बोध को दर्शाती है किन्तु यह रस तालिका अभी तक रिक्त है रति से सम्बन्धित उक्त व्याख्या के माध्यम से हम सिर्फ और सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि 1 काव्य के सन्दर्भ में राग काव्य का वह मूल प्राण है जिसके अभाव में काव्य या तो कोरा संकेत बन कर रह जाता है या लोक व्यापार की वह शृंखला टूट जाती है जो मनुष्य से मनुष्य के बीच प्रेम भाईचारे आदि को जन्म देती है 2 काव्य में रस की स्थिति अंततः इस तथ्य पर निर्भर है कि आश्रय और आलम्बनों के रागात्मक सम्बन्ध किससे और किस प्रकार के हैं अपने पुत्रों के हत्यारे पांडवों को यदि गांधारी अंत तक घृणा और क्रोध का पात्र नहीं बना पाती है तो इसके मूल में गांधारी की वह रागात्मक चेतना है जो सत् और असत् में अंतर करना ही नहीं जानती बल्कि उसे यह भी ज्ञान है कि अति स्वार्थी अहंकारी दम्भी और नारी जाति का अपमान करने वाले वर्ग का एक न एक दिन यही हश्र होता है उस वर्ग में ही उसके पुत्र आते हैं इसके विपरीत धृतराष्ट्र की रागात्मक चेतना सत् के आभाव में ऐसी रागात्मक चेतना बनकर उभरती है जो अंत तक पुत्र मोह में जकड़ी रहकर भीम का छल कपट से वध करने को आतुर रहती है अर्थ यह कि काव्य के हर पात्र में रसोद्बोधंन उसकी अपनी रागात्मक चेतना के अनुरूप ही होता है यदि अयोध्या नरेश श्री राम की रागात्मकता का विषय जन भावना न रहकर केवल सीता ही रही होती तो यह सम्भव नहीं था कि एक धोबी की उलाहना पर वे सीता का वनवास तय कर देते 3 रस के स्थान पर राग को काव्य का सर्वोपरि प्रयोजन तभी माना जा सकता है जबकि राग में सत् तत्त्व मौजूद हो वरना जिस प्रकार रस को अन्तस् चमत्कार का वितानक ब्रह्म सहोदर अमृत स्वरूप मानकर काव्य को भोगविलास व्यभिचार आदि में डालते आ रहे हैं इसी प्रकार के खतरे राग के साथ भी उपस्थित होंगे अतः राग काव्य का मूल प्राण होने के बावजूद काव्य की आत्मा तभी बन सकता है जबकि उसमें सत्योंमुखी चेतना अंतर्निहित हो 4 काव्य के सन्दर्भ में राग जब सत्योन्मुखी चेतना से युक्त होता है तो उसका रसोद्बोधन कोरी आनंदोपलब्धि या मनोरंजन मात्र का साधन न रहकर ऐसी रसात्मकता का परिचय देता है जिसका बीजरूप आचार्य शुक्ल के अनुसार करुणा ठहरता है काव्य को जो चिंतक लोकमंगल से जोड़कर नहीं देखते ऐसे विद्वान रस अलंकार ध्वनि रीति आदि को भले ही काव्य की आत्मा घोषित करने के लाख प्रयास करें किन्तु इन सब तथ्यों की सार्थकता काव्य में अंतर्निहित सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना के बिना संदिग्ध और सारहीन ही मानी जाएगी रमेशराज 15 109 ईसानगर निकट थाना सासनीगेट अलीगढ़ 202001 mob 9634551630 posted by रमेशराज तेवरीकार at 6 32 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest friday may 6 2016 काव्य की आत्मा और सात्विक बुद्धि रमेशराज काव्य की आत्मा और सात्विक बुद्धि रमेशराज आचार्य भोज काव्य के क्षेत्र में आत्मा को अनावश्यक मानते हुए सात्विक बुद्धि की स्थापना करते हैं सात्विक अर्थात् दूसरों के सुखदुख में प्रविष्ट हो सकने की सामर्थ्य वाली मानव चेतना 1 इस प्रकार देखें तो आचार्य भोज काव्य की आत्मा के रूप में सात्विक बुद्धि की स्थापना कर एक तरफ जहां रस को गूंगे के गुड़ का स्वाद होने से बचाया वहीं अलंकार ध्वनि वक्रोक्ति आदि की काव्य में आत्मरूप से प्रतिष्ठित कराये जाने वाली अतिशयता का खुलकर विरोध किया आचार्य क्षेमेन्द्र के औचित्य सिद्धान्त को संशोधित कर आचार्य भोज सात्विक बुद्धि को काव्य में जो आत्म प्रतिष्ठा दी वह हर प्रकार प्रंशसनीय इसलिये है क्योंकि सात्विक बुद्धि में ही वह सामर्थ्य होती है जो सत् असत् अंधेरे उजाले शोषक शोषित अत्याचारी पीडि़त में मात्र अन्तर ही नहीं करती वह असत् से सत् की अंधेरे से उजाले की शोषक से शोषित और अत्याचारी से पीडि़त की रक्षा करने में हर प्रकार सहायक होती है लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि काव्य की आत्मा सात्विक बुद्धि को ही मान लिया जाये आचार्य भोज इस बात पर कोई बल भी नहीं देते दरअसल सात्विक बुद्धि को प्राणवत्ता तो सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना ही प्रदान करती है सत् शोषित पीडि़त से जब तक हमारे सम्बन्ध रागात्मक नहीं होंगे तब तक इनके प्रति न तो किसी प्रकार की रमणीयता का उदय होना सम्भव है और न मन के भीतर प्रेम का संचार हो सकता है अतः यह कहना असंगत न होगा कि दूसरों के सुख दुःख में प्रविष्ट कराने की सामर्थ्य वाली मानवचेतना बिना रागात्मक के या तो तटस्थ हो जायेगी या अपनी मूल सामर्थ्य को ही खो बैठेगी जिस प्रकार रस का निर्णय अन्ततः अर्थनिर्णय पर निर्भर है 2 उसी प्रकार रागात्मकता भी हमारे वैचारिक निर्णयों की देन होती है हम यकायक ही किसी से प्रेम नहीं कर बैठते और न किसी के प्रति विद्रोह जो वस्तु हमारे आत्म अर्थात् रागात्मक चेतना को तोष प्रदान करती हैं उनके प्रति हम में रमणीयता बढ़ जाती है जो वस्तुएं हमारे आत्म को असंतोष या असुरक्षा से अनुभूत करती हैं उनके प्रति हम स्वभाव से विद्रोही हो जाते हैं इस प्रकार हमारी रागात्मकता का चक्र बुद्धि या चेतना के सहारे आत्मसुरक्षा या आत्मतोष के इर्दगिर्द घूमता हुआ आगे बढ़ता है आचार्य भोज रस को अपने तात्विक रूप में अहंकार मानते हैं और अहंकार के व्यक्त रूप को अभिमान 3 अहंकार अर्थात स्वगत रागात्मक चेतना स्वगत रागात्मक चेतना जब शेष सृष्टि के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती है तो उसकी रसात्मकता मात्र रत्यात्मक ही नहीं होती वह कभी वात्सत्यात्मक बनती है तो कभी ममत्व भरी होती है तो कभी उसका रूप श्रद्धात्मक हो जाता है इस प्रकार स्व से घनीभूत रागात्मकता पर की समाविष्टि बन जाती है स्व से पर की ओर जाने की रागात्मक क्रिया जब अधोमुखी होती है तो मोह लालासा लिप्सा कुंठा व्यक्तिवाद दुराचार व्यभिचार और स्वार्थ को जन्म देती है स्व से पर की ओर जाने की रागात्मक क्रिया जब सात्विक होती है तो समस्त जगत् से प्रेमपरक सम्बन्ध स्थापित ही नहीं करती जगत् के प्राणियों पर आये संकट दुखादि के प्रति करुणाद्र भी होती है लोक को संकट में डालने वाले कारकों के प्रति विरोध और विद्रोह की रसात्मकता में सघन होती है आचार्य भोज कहते हैं कि अहंकार या अभिमान को शृंगार भी कहते हैं क्योंकि इसमें मनुष्य को परिष्कृति के उच्चतम शृंग़ पर ले जाने की क्षमता होती है 4 इस प्रकार हम देखते हैं कि भोज ने शृंगार को नयी व्यापकता सार्वभौमिकता ही प्रदान नहीं की उन्होंने अहंकार को एक नूतन ऊर्जा भी दी जिसमें दूसरों की रागात्मकता को परिष्कृत रूप में द्रवित कर अपने में समाहित कर लेने की अपार क्षमता अन्तर्निहित रहती है अहंकार अर्थात् स्वगत् रागात्मक चेतना परगत रागात्मक चेतना को किस प्रकार परिष्कृत द्रवित करती है और अन्त में अपने में समाहित कर लेती है इसको समझाने के लिये यहां एक उदाहरण देना आवश्यक है वह मरा कश्मीर के हिमशिखर पर जाकर सिपाही बिस्तरे की लाश तेरा और उसका साम्य क्या है पीढि़यों पर पीढि़यां उठ आज उसका गान करतीं माखनलाल चतुर्वेदी कवि ने इस कविता में एक ऐसे सिपाही का वर्णन किया है जिसकी रागात्मकता में समूचे राष...
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