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description= Mere khayal, meri diary se...;
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categorized 4 comments june 27 2020 1 minute ये पेड़ कभी तूफ़ाँ में झूलते हुए पेड़ कभी गर्मी में सूखते हुए पेड़ हवाओं का ये मधुर संगीत और उस पर झूमते हुए पेड़ कभी बाद बरसात बरसते और कभी मंद मंद महकते कभी ख़ुदगर्ज़ी से बेहद आहत आदम ज़ात से रूठते हुए पेड़ साथी हैं मेरी ग़ज़लों के मेरी नज़्मों की फसलों के कभी मेरे आंसुओं से भीगे साथ कभी टूटते हुए पेड़ चश्मदीद मेरे बचपन के यार थे ये मेरे यौवन के उम्र ए दराज़ हैं अब तो दिन ब दिन भूलते हुए पेड़ सीख सरल मिलती है हर पल समझ सके तो समझ ले पागल जड़ें ज़मीन से जोड़ के गहरी आसमानों को चूमते हुए पेड़ mukundbhatt uncategorized 6 comments june 4 2020 1 minute जाने क्यूँ कुछ अजीब सा आलम रहता है आजकल खुद ही से रूठ जाता हूँ खुद ही को फिर मनाता हूँ खुद ही को तबाह करके खुद को खुद ही से बनाता हूँ ना जाने किसका इंतज़ार है जाने क्यूँ दिल उदास है ना आगे किसी से मिलने की उम्मीद ना पीछे किसी के आवाज़ देने की आस है जाने क्यूँ चलते चलते कदम रुक जाते हैं जाने क्यूँ भूल जाने पर भी लोग याद आते हैं जाने क्यूँ जाते हुए कोई हाथ थाम लेता है जाने क्यूँ भूला हुआ कोई अकेले में साथ देता है mukundbhatt uncategorized leave a comment april 7 2020 1 minute मन नहीं करता मुझे अब और लिखने का मन नहीं करता अपने मन जैसा दिखने का मन नहीं करता नफ़ा नुकसान अब बहुत झेल लिया मैंने इश्क़ में और बिकने का मन नहीं करता इन हार जीत के चक्करों से तंग आ चुका हूँ अब इस बाज़ीचा ए जीस्त में और टिकने का मन नहीं करता मैं नासमझ नामुराद मुझे अधपका ही रहने दो अब इन साँसों के तवे में सिकने का मन नहीं करता उम्मीद है कभी तो किसी लकीर के माने खुलेंगे इनका अब मेरी हथेली से मिटने का मन नहीं करता mukundbhatt uncategorized leave a comment february 21 2020 1 minute मदमस्त वो ज़ुल्फ़ें बिखराए बेफिक्री से झूमना तेरा वो खुद ही को देख कर खुद ही को चूमना तेरा वो रास्तों में गुम हो कर भटकने का डर चेहरे पर अगले ही पल फिर दुपट्टा लहराए हरसू घूमना तेरा तेरी अदाओं से वाकिफ़ ये हवाएँ ये दश्त हैं तभी तो सब ही तेरे साथ आज मदमस्त हैं mukundbhatt uncategorized leave a comment january 30 2020 1 minute वो सुंदरी मैं रंग रूप का मारा सा वो सुंदर सी इक काया सी इक नामुराद सी जान हूँ मैं वो अरमानों की छाया सी मैं घोर मलिन लोभ मोह वो कोमल कोई माया सी उसकी छवि रब का प्रकाश मैं उसकी मिट्टी ज़ाया सी सूरत उसकी मन का सुकूँ तस्वीर मेरी पराया सी मेरे चरित्र पर कोहरा चढ़ा उसकी मूरत नुमाया सी mukundbhatt uncategorized 4 comments january 2 2020 january 3 2020 1 minute ये मरासिम ये जो जज़्बातों में बह कर राब्ता क़ायम किया था हमने इस मरासिम ने तुझको क्या दिया कुछ भी नहीं इस मरासिम ने मुझको क्या दिया कुछ भी नहीं पर हाँ खुदगर्ज़ निकला ये राब्ता न तुझसे न मुझसे वफ़ा निभाई तुझसे तेरा सुकून ले गया मुझसे मेरी ज़िंदगी mukundbhatt uncategorized leave a comment november 22 2019 november 22 2019 1 minute रूह का लिबास बदल लें ये रूह मेरी हर पल कहती है चल अब लिबास बदल लें कुछ एहसास बदल लें बदल लें लफ़्ज़ों के मानी दूर और पास बदल लें और खुश रहने की वजहें किसी और की मुस्कान थी जो अब बेवजह ही मुस्कुराएँ वो सूरत ए उदास बदल लें मौके कई दे दिए अब तलक यक़ीन का इम्तिहान भी बहुत हुआ इस बार ख़ुद और ख़ुदा पर कुछ थोड़ा विश्वास बदल लें ख़ुद ही का हमसफर अब ख़ुद ही को बनाया जाए वो ख़्वाहिशों में कहीं दबा हुआ अगर और काश बदल लें मैं और तू के तर्क से दूर उस शजर की छाँव में बैठें कुछ देर दम लेकर फिर कुछ ज़मीं कुछ आकाश बदल लें mukundbhatt uncategorized 4 comments november 12 2019 july 3 2022 1 minute इंतज़ाम सब है महफिलों से भरी गलियों में रहता हूँ जाम इश्क़ यार सर ए आम सब है तू बस एक बार आने की हामी तो भर मेरी जान यहाँ इंतज़ाम सब है कोई यहाँ तुझे पहचान भी जाए तो डर नहीं मेहमान ओ मेज़बान ओ मकान यहाँ बदनाम सब है तेरा मज़हब मेरा खुदा किसी का ज़िक्र नहीं यहाँ के काफिरों में ये हराम सब है तन्हाई का नाम ओ निशाँ नहीं यहाँ दिल फेक आशिक़ मेहरबान सब है mukundbhatt uncategorized 2 comments october 19 2019 1 minute वो पल तेरी तस्वीर आज जब मेरे रूबरू हुई इक पल को वो बात याद आई जो तब तुझसे कहना रह गया न पलकें झपकाई न होंठ हिले इक आखरी अक्स तेरा था जो आंखों में वो भी इस कतरे आँसू के साथ बह गया मैं तकता रहा तेरा चेहरा वो तेरे बाल तेरे रुखसार और तेरी आँखों से छलकता प्यार मैंने बस वक़्त गँवा दिया लफ्ज़ चुनने में तू आया मुस्कुराया हाथ पकड़ा और अलग होने का अपना फरमान कह गया सब तो ख्वाब सा ही लगा उस पल इश्क़ कहाँ बचपना था शरारत थी फिर भी तेरे बिना ज़िन्दगी आफत थी मैं काफी देर तक उसी जगह खड़ा रहा तूने मुड़ के देखा नहीं पर वो कच्चा पक्का सा रेत का महल तेरे जाते ही ढह गया आज इतने सालों बाद जब फिर तुझे देखा दिल फिर उसी जगह जा के गिर पड़ा जहाँ उस रोज़ मैं था खड़ा तब लफ्ज़ नहीं थे तो तुझे रोक न पाया आज लफ्ज़ हैं बेशुमार हैं पर तू नहीं दिल मेरा तब भी चुप था अब भी सब सह गया mukundbhatt uncategorized 6 comments september 24 2019 1 minute तू मोहताज नहीं तू किसी तारीफ की मोहताज नहीं तू मल्लिका है भले तेरे सिर पे ताज नहीं तेरा जमाल छिपा रहे दुनिया से ऐसा कोई पर्दा कोई रिवाज नहीं तेरे हुस्न से टक्कर हो बराबर की यहाँ हसीन ऐसा कोई आज नहीं यहाँ से वहाँ तक कि कतार में देख ले कौन सा ऐसा दिल है जिसमें तेरा राज नहीं जो बात रखनी है खुल के बोल मेरे दिल की मेज़ पर दराज नहीं mukundbhatt uncategorized 3 comments september 2 2019 september 2 2019 1 minute इज़हार ए इश्क़ इतनी लंबी ग़ज़लें लिख डाली ये पन्ने भर भर के नज़्में ये अश आर के पुलिंदे लगे हुए बस इतना ही तो कहना था कि चाहते हो मुझे घर को जाते हुए उस सुनसान रास्ते पर चलते हुए मेरा हाथ छू लेते काफी होता उतना ही मेरे समझने के लिए या फिर मुझे गले लगा लेते जब उस शाम बारिश के दौरान बिजली कड़की थी और सहम गई थी मैं या फिर बस सामने आ कर इज़हार कर देते अपनी मोहब्बत का जवाब तो सवाल से पहले ही तुमने मेरी आँखों मे पढ़ लिया था न mukundbhatt uncategorized leave a comment august 18 2019 july 3 2022 1 minute एहसान फरामोश मैंने चुन चुन के उन्हीं का नाम उछाला है जिनके कपड़े सफेद और दिल काला है तुम कहते हो आएगी सहर इक रोज़ ज़रूर मुझे भी ज़रा दिखाओ किधर को उजाला है एक पल अर्श पर अगले ही पल फर्श पर इस जग का रवैया ही निराला है इस अहल ए जहाँ से क्या उम्मीद रखूँ ईमानदारी की जिसने मीरा की भक्ति में भी खोट निकाला है बात निकाल दूँ अभी गर मैं बिखर जाएंगे कई न जाने कितनों की दुनिया को लफ़्ज़ों में अपने सम्हाला है तुम सामने न आ जाना पहचान लूंगा तुम्हे तुम क्या जानो ये मंज़र किस कदर अब तक टाला है लड़खड़ाऊंगा मैं तो सम्हालेंगे कई हाथ मुझे क्या खूब अब तक ज़हन में गलतफहमी को मैंने पाला है और तो किसी से उम्मीद न थी मुझे तेरे सिवा ए ख़ुदा अब छोड़ कहने को न बचा तुझसे भी अब कोई नाला है mukundbhatt uncategorized 4 comments august 10 2019 august 10 2019 1 minute उस तक पहुँचे कोई तो दास्तान इन्तेहाँ तक पहुँचे तेरे बिन कौन जाने कौन कहाँ तक पहुँचे मैं बुलाता हूँ तुझे मिलने यहाँ मुसलसल ये तमन्ना मुकम्मल जाने किस जहान तक पहुँचे दर्द इश्क़ आंसू मुस्कान बहुत कुछ है फरियादी कोई लेकिन पहले दुकान तक पहुँचे मेरे हँसने की आवाज़ें सुनाई देती हैं तुझे अक्सर कभी ये सदा भी तुझ मेहरबान तक पहुँचे सुबह ही करवा दी थी खबर उसे जनाज़े की शायद ही वो घर पर शाम तक पहुँचे पहुँच से दूर बहुत है मेरी वो अब कम से कम अब हाथ मेरा मेरे जाम तक पहुँचे mukundbhatt uncategorized 2 comments july 20 2019 july 20 2019 1 minute आखरी खत वो उनका आखरी ख़त भी आज खो गया दूर तो होना ही था उन्हीं की तरह सो गया डरता हूँ कि कहीं उनसे भूले से मुलाक़ात न हो क्या पता पहचाने ही न सामने उनके जो गया नाम उनका आया जब महफ़िल में मेरी आज होंठ तो मुस्कुराए दिल तो बस रो गया क्यों इल्ज़ाम आए मुझपर दिल लगाने का उनसे उनका होकर रह गया रूबरू उनके जो गया रुस्वा मुझे किया कुछ इस सलीक़े से खुद तो वो गया हर याद धो गया अब तो बस मिलना मुझसे शायरी में होता है बात पर होती नहीं दूर इस कदर वो गया mukundbhatt uncategorized leave a comment june 26 2019 1 minute छुट्टी इक इक कर सामान कम होता चला गया पहले बहु फिर बेटा चला गया अब फिर बस हम दो ही घर में अकेले बचे अगली बार लंबी छुट्टी आऊंगा कहता चला गया अब फिर वही रूखी सी सुबह होगी गुम से बेमौसम बरसात की तरह होगी न हमें तेरा चेहरा देखने का मौका होगा न तेरे साथ बैठने का कोई तरीका होगा अब तुझसे बातें न होंगी अखबार की बुराई अब किससे करूँगा भ्रष्ट सरकार की नाश्ता न करने का इक बहाना मिल जाएगा दिन का खाना खाते हुए कौन सा चेहरा खिल जाएगा शाम की सब्ज़ी अब वैसी ज़ायकेदार न होगी रोटी की मांग एक के बाद दूसरी की बार बार न होगी अब तो ये बाग भी यूँ ही बेज़ार रहेगा अब इसे भी मेरी तरह तेरी अगली छुट्टी का इंतज़ार रहेगा mukundbhatt uncategorized leave a comment june 18 2019 1 minute छूने दे छूने दे किसी बहाने से या दूर कहीं ज़माने से किसी की नज़र में हम न आएं मेरी नियत पे कहीं किसी का शक न जाए जानता हूँ कि पसंद है तुझे तेज़ दौड़ना और हवाओं में उड़ना कुछ इत्मिनान रखना ख्वाइशों पे लेकिन तेरा यार कहीं आधे में थक न जाए mukundbhatt uncategorized 4 comments june 12 2019 1 minute दास्तान ए मुलाक़ात न हुआ उसका तो तू क्या तू हुआ कैसा तेरा इश्क़ जो उसके हाथों न बेआबरू हुआ किस्से मुक़म्मल तो कई होंगे पास तेरे बता कोई वाकिया जो उसके नाम से शुरू हुआ दिन का सुकून गया रातों की तसल्ली गयी वाह रे तेरा तो इश्क़ ही तेरा उदू हुआ कयामत हुई या सैलाब आया या दर खुदा का खुला भला मंज़र कैसा था जब तू उसके रूबरू हुआ लफ़्ज़ों को अपने न ज़ाया कर सुन रहा हूँ तेरी आँखों से दास्ताँ कि यूँ हुआ औऱ यूँ हुआ mukundbhatt uncategorized 2 comments june 4 2019 1 minute क्या बात है माना तू ख़फ़ा है मुझसे पर मेरी नज़्मों से नाराज़गी कैसी इन्होंने तो नहीं तोड़ा दिल तेरा फिर इन पर तेरी बेरुखी की बेचारगी कैसी इनमें ही मेरा इश्क़ बसता इनमें ही तेरा अक्स दिखता हाँ हो सकता है दिखे होंगे कभी साथ मेरे पर होते हैं ये अक्सर पास तेरे इनसे तो तूने घंटों बातें की हैं इनके जरिए मुझसे जाने कितनी मुलाक़ातें की हैं इन्हीं के सजदों में कभी तेरे आँसू बहे थे इन्हीं की पनाहों में छिपे तेरे कहकहे थे इन्हीं में तेरे हर मिज़ाज को मैंने पिरोया है इन्हीं ने अकेले में तेरे ज़ख्मों को भी धोया है इन नज़्मों के ख़ुमार में कितनी ही शब ढली इन्ही की मखमली चादर में कितनी सहर खिली इनपे तेरा हक़ तेरा ही ज़ोर रहेगा तेरे होने से बोल उठता था हर लफ्ज़ तेरे बिन शायर भी क्या और कहेगा इनका वजूद है तब ही तक जब तक तू साथ है वार्ना मरे हुए शेरों पे कौन कहता है क्या बात है mukundbhatt uncategorized leave a comment may 21 2019 may 21 2019 1 minute ज़ायका सुर्ख रंग का गर चे वाक़िफ़ है हर दास्ताँ ए मोहब्बत से ऐ साक़ी ज़ायका मुझे सुर्ख़ रंग का बता हँसाना रुलाना या रुसवा कर जाना क्या है मोहब्बत मुझे भी सिखा तेरी नज़र से नहीं परे इन दो जहाँ के सच जन्नत की हक़ीक़त जहन्नुम की हूरें दिखा सुना है सिखाता है तू सभी को इश्क़ के गुर मुझको भी ज़रा ख़ुदगर्ज़ी के नुस्ख़े सिखा टूटते देखे हैं मैंने सितारे तेरी ठोकरों पे कुछ ऐसी ही मोहब्बत मुझसे भी जता बहुत जी लिए ख़ुश फ़हमियों से घिर कर अब कुछ दर्द मुझे दे कुछ ख़ुद को सता कई होंगे यक़ीनन आस पास तेरे कुछ वक़्त ज़रा ख़ुद के साथ बिता मुलाक़ातें कर ले कुछ रक़ीबों से भी बज़्म में शामिल कर दूरियाँ मिटा mukundbhatt uncategorized leave a comment may 18 2019 august 10 2019 1 minute अलग बात है आँखें उनकी ढूंढती नहीं अब भीड़ में आँखें मेरी कभी सुकून ए दिल था दीद मेरा भी अलग बात है अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें अलग बात है कहाँ आना होता है मेरी गली में उनका आजकल भूल जाने के बहाने ही मिल जाया करते थे पहले अलग बात है नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं अलग बात है छुप कर मुझे देखना तो दस्तूर सा था उनका सामने से गुजरते हुए भी मुँह फेर लेते हैं अब अलग बात है वादा तो था ज़िन्दगी भर साथ निभाने का दो कदम चल कर भूल गए जो अलग बात है mukundbhatt uncategorized 10 comments may 9 2019 1 minute चलते रहने दो न तुमसे बातें साफ कही जाएंगी न मुझसे हालात नुमाया होंगे इल्ज़ाम मैं ले लेता हूँ तुम्हारे भी बेकार ही लफ्ज़ तुम्हारे ज़ाया होंगे कौन सा तुम्हें कोई फर्क ही पड़ जाएगा खून हो या आँसू मेरे बहने दो न बस में कुछ मेरे है ना तुम्हारे जैसा चल रहा है चलते रहने दो mukundbhatt uncategorized 8 comments april 29 2019 1 minute उसका ख़याल उसके जिस्म को पा जाने की तमन्ना कभी न थी पर उसकी रूह को छू लेने का ज़रूर ख़याल रहा मेरे ज़ेहन में उसका अक्स जाने कब से है काबिज़ क्या मैं भी हूँ उसकी आँखों में ये सवाल रहा वो आएगी महफ़िल में यक़ीन था देर से ही सही फिर भी उससे मिलने तलक ये दिल बेहाल रहा छू कर उसे जल गए उसके कई दीवाने परवाने उसकी पनाह से दूर रह कर जीने का मुझको मलाल रहा दिन फिर गुज़र गया उसके दीद के इंतज़ार में खुद से अकेले में उसकी बातों का सिलसिला बहरहाल रहा उसने नज़र की थी मुझपर बस पल भर के लिए ता उम्र ख़ुशियों से मैं लेकिन मालामाल रहा mukundbhatt uncategorized 2 comments april 24 2019 1 minute दुनिया चल रही है साँसे थमी हैं उनकी कमी खल रही है बाकी दुनिया जैसी थी वैसी ही चल रही है सब ठीक है यूँ तो पर ये क्या उन्होंने मुस्कुराया धड़कन बहल रही है मैं अब भी वही हूँ नियत का अपनी पक्का फिर क्यों उन्हें देख आज रूह पिघल रही है बहुत पी ली उनके नाम पर अब बस भी कर यार लड़खड़ाती तेरी चाल अब बहुत सम्हल रही है इंतेज़ार अब बेसब्र हो चला है बा मुश्किल होगा देखो अब तो ये शमा भी रंग बदल रही है ऐसे कैसे ठंडी पड जाएगी आग उनके दिल की जब तलक उनकी लगाई आग यहाँ जल रही है थी उम्मीद पर अब नहीं उन्हें गले लगाने की जैसे दिन ब दिन उनसे मुलाकात की तारीख टल रही है बेहिसाब सितम उनके और बेचैन जान हमारी उनकी शाम सुकून में भला कैसे ढल रही है गले से लगा कर समां लूँ खुद में उनको ऐसी भी तमन्ना अब इस दिल में पल रही है मैंने तो अपनी जान को जाते हुए देखा है क्या मुझे जाता देख उनकी जान भी हथेली से फिसल रही है mukundbhatt uncategorized leave a comment april 10 2019 1 minute तेरा इश्क़ ये अल्फ़ाज़ों का सौदा मुस्कान के साथ वो अपनों सा सलीखा मेहमान के साथ मुझे अपने नज़दीक रखना गुमान के साथ ऐ साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं कभी मेरी पनाहों में तेरा गुम हो जाना कभी तेरा मेरे मुझसे नज़दीक आना इक पल सब याद अगले पल भूल जाना ऐ साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं कभी चोट मुझपे मुसलसल तेरी कभी फिर बेहिसाब मोहब्बत तेरी कभी सिर्फ़ दीदार की इजाज़त तेरी ए साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं कभी तेरी हर महफ़िल की जान मैं तेरा ज़मीन ओ आसमान मैं तेरा दीन धर्म ईमान मैं कभी अजनबी अनजान मैं ऐ साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं तन्हाई का कभी तेरे इलाज हूँ कभी तेरी ज़िंदगी का साज़ हूँ कभी तो मेरा वजूद नहीं कभी तेरा हुस्न तेरा मिज़ाज हुँ ए साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं तेरा इश्क़ मेरा फ़ितूर है तेरी रुसवाई भी मंज़ूर है तेरी मुस्कान मैं वजह नहीं तू नाराज़ मेरा क़ुसूर है ऐ साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं सहर तुझसे तेरी ही हर शाम तू ही बक्श देता है कभी ये जान तेरे ही दर पे सजदा सलाम तेरे ही लबों से ज़हर का जाम ऐ साक़ी तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं mukundbhatt uncategorized 6 comments march 22 2019 1 minute तू मेरी ज़िंदगी में तेरी सूरत अनजाने में ही सही पर आँखो में बसी है तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है मेरी हर याद में तेरी ही छवि है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है तुझपे हक़ है मेरा मुझमें तू समाई है ना फिर जुदा हो सके खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है तू नहीं आसपास जो आँखो में मेरे नमी है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है सुकून दिल को तेरे नाम से बेचैन जान मेरी फुरकत ए शाम से तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से इश्क़ ओ जंग में सब सही है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी सच कह मेरी सदा तूने सुनी है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है mukundbhatt uncategorized leave a comment march 15 2019 march 15 2019 1 minute तू मेरी ज़िंदगी में तेरी सूरत अनजाने में ही सही पर आँखो में बसी है तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है मेरी हर याद में तेरी ही छवि है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है तुझपे हक़ है मेरा मुझमें तू समाई है ना फिर जुदा हो सके खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है तू नहीं आसपास जो आँखो में मेरे नमी है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है सुकून दिल को तेरे नाम से बेचैन जान मेरी फुरकत ए शाम से तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से इश्क़ ओ जंग में सब सही है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी सच कह मेरी सदा तूने सुनी है तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है mukundbhatt uncategorized leave a comment march 15 2019 1 minute मिलने की तारीख उनके ज़हन को बेचैनी का ख्याल दे ऐ दिल उनसे मिलने की तारीख एक दिन और टाल दे चलते रहने दे इशारों के ये सिलसिले यूँ ही कुछ और रात...
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