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सम्बंधित, मूर्खता, जाएगी, क्रान्तिकारी, सुखदेव, थापर, संयम, पत्रों, पुस्तक, लाबी, आजकल, खासी, बनाना, बढ़ावा, कन्धा, निशाना, चाहिएँ, प्रखर, सिद्धान्तों, कीमत, समझौता, बलिदानी, प्रत्यक्ष, स्वतंत्रता, संदिग्ध, धारा, थोंपना, कतई, छद्म, प्रोपगंडा, भावुक, अपरिपक्व, समग्र, अनभिज्ञ, रखकर, राजनैतिक, आदर्शों, अध्यात्मिक, अग्रज, महान्, कवि, लेखक, युवाओं, द्रष्टा, क्रांति, सूत्रपात, रचित, पढऩे, कट्टर, पंडित, प्रसाद, बिस्मिल, ब्रह्मचर्य, साक्षात्, 2013, ध्यान, रखें, मनु, विचारशक्ति, श्रेणियां, वर्तमान, संदर्भ, शासन, प्रशासन, संचालन, श्रेणियों, श्रेणी, पूर्ण, महत्व, wednesday, november, 2018, महेन्द्रपाल, घन्यवाद, चूंकि, जुडी, कहकर, दूषित, कारनामों, संभव, किस्से, लिखता, रहूँगा, बिलकुल, कपोल, कल्पित, विश्वासका, पराकाष्ठा, सिर्फ, खून, रंगा, निष्ठुरता, जिसने, काट, क़ुरबान, पीने, मुहैया, करा, सके, लेने, अल्पज्ञ, सर्वज्ञ, ज्ञात, इम्तेहाँन, बेटे, यात्रीयों, पड़ता, हांजरा, आदेश, बेशक, कोहे, सफ़ा, कोह, निशानियों, ख़ानए, काबा, उमरा, दोनो, दरमियान, तवाफ़, आमद, रफ्त, गुनाह, सवाब, क़दरदाँ, वाक़िफ़कार, सात, बिवी, दौड़ती, चर्चा, إِنَّ, الصَّفَا, وَالْمَرْوَةَ, مِن, شَعَائِرِ, اللَّهِ, فَمَنْ, حَجَّ, الْبَيْتَ, أَوِ, اعْتَمَرَ, فَلَا, جُنَاحَ, عَلَيْهِ, أَن, يَطَّوَّفَ, بِهِمَا, وَمَن, تَطَوَّعَ, خَيْرًا, فَإِنَّ, اللَّهَ, شَاكِرٌ, عَلِيمٌ, ١٥٨, प्यास, मारे, इधर, उधर, भटक, रेतीले, पहाड़, मृग, मरीचिका, सफा, पहाड़ों, बीच, भागती, बियावान, जंगल, मरूभूमी, छोड़, जहाँ, ठिकाना, पाए, जविह, उल्लाह, इब्राहिम, तुम्हारी, कुर्बान, लगातार, तीन, काटते, बाकि, क्योकि, खलीलुल्लाह, जिन्हें, चाहा, यालेमुल, गैब, tuesday, जानना, मना, यहां, मुट्ठी, पड़ेगा, किसने, बोल, भावनाओं, ठेस, पहुंचा, संबंध, जमीन, उसने, चांद, टुकड़े, हनुमान, जस्टिफाई, वेदज्ञान, आँखों, पर्दा, हटाकर, जानकारी, अवगत, पन्थ, ईश्वरिय, भ्रान्तिया, मूर्ति, नियम, बरगलाने, सारी, बाते, उससे, बनने, वायु, तेज, क्रोध, मोह, अंदर, उत्त्पति, वाणी, ध्वनि, हमारा, पञ्च, पहला, सर्वत्र, व्याप्त, अणुओं, सूक्ष्मता, इतनी, इसकी, उपस्थिति, भान, पाता, इसमें, गन्ध, वायू, अग्नि, चारो, रखते, वेदोक्त, अविरुद्ध, युद्ध, इनकी, अविद्या, अंधकार, विस्तृत, भ्रमयुक्त, आया, चलाया, तात्पर्य, दृष्टि, बरतना, मतांतर, अन्यो, विद्वत, ईर्ष्या, द्वेष, छोड़, ग्रहण, कराना, असाध्य, विद्वानों, सबको, जाल, फंसा, फंसकर, सबके, एकमत, जाएं, सर्वशक्तिमान, प्रवृत्त, उत्साह, सदृश, सुवर्णभूमि, सुवर्णादि, रत्नों, पुरुषों, दस्यु, जितने, प्रशंसा, पर्यंत, सार्वभौम, चक्रवर्ती, सर्वोपरि, मांडलिक, भ्रम, पड़कर, बकते, बुद्धिमान, मिश्र, वालों, यूनानी, रोम, जर्मनी, एरंड, जर्मन, थोड़ा, न्यून, गणना, फैले, गोल्डस्टकर, पेरिस, फ्रांस, बाइबिल, इंडिया, भलाइयों, प्रार्थना, पूर्वकाल, वैसी, कीजिए, मनीषियों, 164, उपजे, कल्पनातीत, सर्वे, भवन्तु, सुखिनः, वसुधैव, कुटुंबकम्, स्वीकारता, धर्मों, सच्चा, बाकी, दूसरों, तैयार, शिष्य, अथातो, ब्रह्मजिज्ञासा, गुरुवर, ब्रह्म, जिज्ञासा, शील, तद्, असि, जिज्ञासु, आतुर, तुम्हारे, भीतर, प्राप्ति, बताते, उसमे, god, चुने, हुये, व्यक्ति, पैगंबर, माध्यम, आसमानी, किताब, अनिवार्य, लाना, काफ़िर, वाजिबुल, कत्ल, वास्तव, दृष्टिकोण, जाय, चलता, गतिशील, बेहतर, प्रयत्न, निहित, शक्तियों, अवतरित, हार, खड़ी, कामना, महावीर, बुद्ध, जीजस, मोहम्मद, कबीर, नानक, प्रकट, एकात्मकता, परिचित, कराती, 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ै वाजिबुल कत्ल है जब कि वास्तव में सनातन दृष्टिकोण से देखा जाय तो मानव निरंतर चलता रहे गतिशील रहे बेहतर के लिए प्रयत्न करता रहेगा यही उसके श्रेष्ठ होने का प्रमाण है मानव में निहित शक्तियों के रूप में कृष्ण बोलते हैं कि जब जब धर्म की हानि होती है तब तब मेरे जैसे लोग अवतरित होते हैं अवतार मनुष्य की निरंतर जीने की इच्छा ही है जो हर हार के बाद फिर से उठ खड़ी होती है और यह निरंतर जीने की कामना कभी महावीर कभी बुद्ध कभी जीजस कभी मोहम्मद कभी कबीर कभी नानक तो कभी गांधी के रूप में प्रकट होती है जो समस्त सृष्टि में छुपी एकात्मकता से परिचित कराती है किंतु कुछ काल में मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति चतुराई के साथ ऐसा अंधेरा बुनती है कि यह सारा तत्वज्ञान ओझल होने लगता है उनके अनुयाई अपने स्वार्थ में तत्वज्ञान के नाम पर एक नया रास्ता ही निकाल देते हैं इसी तरह ज्ञान के मुख्य पथ से खुद को भगवान घोषित करती हुई ना जाने कितने मजहब मत पंथ एवं संप्रदाय निकल आये और सत्य मार्ग आंखों से ओझल हो गया धर्म और प्रभु तत्व के लालच में संगठित ऐसे धार्मिक लुटेरों ने अपने कृत्यों से धर्म को और बदनाम किया है इसी स्वार्थी सोच के तहत मनुष्य अपने इलाके की बोली भाषा और धर्म के तहत एक दूसरे को जानता पहचानता है और विश्वास करता है इसी का लाभ मनुष्य को बांटते वाली ताकतें उठाती है और अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करती है भारत में भले ही अधिकतर मुस्लिम की आस्था का केंद्र अरब देश हो उनके धर्म के मुख्य केंद्र मक्का मदीना हों लेकिन उन सभी के पूर्वज यहीं के हैं उनका डीएनए उनको यही का सिद्ध करता है उन्हें बाहर का कोई भी इस्लामी देश स्वीकार नहीं करता और ना ही वह वहां पर जाकर खुश ही होंगे लेकिन आज उन्हीं के द्वारा गंगा जमुनी तहजीब पर शंका उठाने की प्रवृत्ति सक्रिय नजर आने लगी है जबकि समाजवादी विचारधारा के बावजूद चीन में मुसलमानों से उसके नमाज करने की चटाईयां एवं कुरान की प्रतियां जप्त की जा रही है अमेरिका में सरदारों को महज दाढ़ी होने के कारण मुसलमान समझ कर पीटा जा रहा है हमले किए जा रहे हैं विभिन्न इस्लामी देशों में उसी धर्म के मानने वाले अनुयायियों के द्वारा कत्लेआम एवं नृशंश गोलाबारी किस मानवतावादी धर्म का संकेत है विज्ञान की शिक्षा समस्त विश्व में एक ही है और जब भी कोई संशोधन होता है तो यह समस्त विश्व में एक समान लागू होता है जबकि धार्मिक शिक्षा के साथ ऐसी बात नहीं है समस्त तथाकथित धार्मिक शिक्षायें आज अलगाववाद का सृजन ही करती नजर आती हैं सरकारों द्वारा धार्मिक शिक्षाओं के नाम पर समाज में फूट डालने वाली शिक्षाओं को कोई छूट देने की अनुमति नहीं होनी चाहिए सभी स्कूलों का पाठ्यक्रम एक सा होना चाहिए क्योंकि बिना ऐसी शिक्षा के दुनिया में घृणा और कुटिलता का अंधेरा आस्था और धर्म का रूप धर कर बार बार आता ही रहेगा मदन शर्मा आर्य समाज चौक प्रयाग प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 12 52 pm no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest जब तक वाद न छूटेगा तब तक आनंद नहीं जब तक वाद न छूटेगा तब तक आनंद नहीं यह सिद्ध बात है कि पांच सहस्र वर्षों के पूर्व वेद मत से भिन्न दूसरा कोई भी मत नहीं था क्योंकि वेदोक्त सब बातें विद्या से अविरुद्ध हैं वेदों की अप्रवृत्ति होने के कारण महाभारत युद्ध हुआ इनकी अप्रवृत्ति से अविद्या अंधकार के भूगोल में विस्तृत होने से मनुष्यों की बुद्धि भ्रमयुक्त होकर जिसके मन में जैसा आया वैसा मत चलाया मेरा तात्पर्य किसी की हानि वा विरोध करने में नहीं किंतु सत्यासत्य का निर्णय करने कराने का है इसी प्रकार सब मनुष्यों को न्याय दृष्टि से बरतना अति उचित है मनुष्य जन्म का होना सत्यासत्य का निर्णय करने कराने के लिए है न कि वाद विवाद करने कराने के लिए जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मत मतांतर का विरुद्ध वाद न छूटेगा तब तक अन्यो अन्य को आनंद न होगा यदि हम सब मनुष्य और विशेष विद्वत जन ईर्ष्या द्वेष छोड़ सत्यासत्य का निर्णय करके सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना कराना चाहें तो हमारे लिए यह बात असाध्य नहीं है यह निश्चय है कि इन विद्वानों के विरोध ही ने सबको विरोध जाल में फंसा रखा है यदि ये लोग अपने प्रयोजन में न फंसकर सबके प्रयोजन को सिद्ध करना चाहें तो अभी एकमत हो जाएं सर्वशक्तिमान परमात्मा एक मत में प्रवृत्त होने का उत्साह सब मनुष्यों की आत्माओं में प्रकाशित करे यह आर्यावर्त देश ऐसा देश है जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं है इसीलिए इस देश का नाम सुवर्णभूमि है क्योंकि यही सुवर्णादि रत्नों को उत्पन्न करती है इसीलिए सृष्टि की आदि में आर्य लोग इसी देश में आकर बसे इसीलिए हम सृष्टि विषय में कह आए हैं कि आर्य नाम उत्तम पुरुषों का है और आर्यों से भिन्न मनुष्यों का नाम दस्यु है जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी देश की प्रशंसा करते हैं सृष्टि से लेकर पांच सहस्र वर्षों से पूर्व समय पर्यंत आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती अर्थात भूगोल में सर्वोपरि एकमात्र राज्य था अन्य देशों में मांडलिक अर्थात छोटे छोटे राजा रहते थे जो संस्कृत विद्या को नहीं पढ़े वे भ्रम में पड़कर कुछ का कुछ लिखते और कुछ का कुछ बकते हैं उसका बुद्धिमान लोग प्रमाण नहीं कर सकते और जितनी विद्या भूगोल में फैली है वह सब आर्यावर्त देश से मिश्र वालों उनसे यूनानी उनसे रोम और उनसे यूरोप उनसे अमेरिका आदि में फैली है अब तक जितना प्रचार संस्कृत विद्या का आर्यावर्त में है उतना किसी अन्य देश में नहीं जो लोग कहते हैं कि जर्मनी देश में संस्कृत का बहुत प्रचार है और जितना संस्कृत मैक्समूलर साहब पढ़े हैं उतना कोई नहीं पढ़ा यह बात कहने मात्र को है जिस देश में कोई वृक्ष नहीं होता वहां एरंड को ही बड़ा वृक्ष मान लेते हैं वैसे ही यूरोप में संस्कृत का प्रचार न होने से जर्मन लोगों और मैक्समूलर साहब ने थोड़ा सा पढ़ा वही उस देश के लिए अधिक है परंतु आर्यावर्त देश की ओर देखें तो उनकी बहुत न्यून गणना है यह निश्चय है कि जितनी विद्या और मत भूगोल में फैले हैं वे सब आर्यावर्त देश से ही प्रचारित हुए हैं एक गोल्डस्टकर साहब पेरिस अर्थात फ्रांस देश निवासी अपनी बाइबिल इन इंडिया में लिखते हैं कि सब विद्या और भलाइयों का देश आर्यावर्त है और परमात्मा की प्रार्थना करते हैं कि हे परमेश्वर जैसी उन्नति आर्यावर्त देश की पूर्वकाल में थी वैसी ही हमारी देश की कीजिए महर्षि दयानन्द सरस्वती प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 4 35 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest sunday september 1 2019 प्रश्न पांच तत्व में पृथ्वी जल वायू और अग्नि ये चारो तत्व तो हम रखते हैं मगर आकाश तत्व हमारे शरीर में कहां है उत्तर हमारा शरीर भी पञ्च तत्वो से ही बना हैं आकाश तत्व पहला तत्व है तथा सर्वत्र व्याप्त हैं इस तत्व के अणुओं की सूक्ष्मता इतनी ज्यादा हैं कि इसकी उपस्थिति का हमें कोई भान नहीं हो पाता हैं शब्द इस तत्व का एकमात्र गुण है इसके अलावा इसमें अन्य कोई भी गुण जैसे कि स्पर्श रूप रस व गन्ध नहीं होता हैं हमारे शरीर में शब्द की उत्त्पति इस आकाश तत्व के कारण से ही होती हैं हम जो भी बोलते हैं वो शब्द वाणी या ध्वनि इस तत्व की ही देन हैं जब यह आकाश तत्व अन्य तत्वो में मिलता हैं तो उससे अन्य कई नए गुण हमारे इस शरीर में बनने लगते हैं आकाश व वायु तत्व के मिश्रण से काम उत्पन्न होता हैं आकाश व तेज तत्व के मिश्रण से क्रोध आकाश व जल तत्व से मोह व आकाश व पृथ्वी तत्व से भय के गुण हमारे अंदर बनते हैं प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 4 02 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest saturday august 31 2019 आर्यसमाज के विषय में आज लोगों में भिन्न भिन्न प्रकार की भ्रान्तिया है कुछ लोगों का मानना है की आर्यसमाज नास्तिक संगठन है जो ईश्वर को नहीं मानते मूर्ति पूजा के विरुद्ध है आर्य समाज के नियम बहुत कठिन है आर्य समाज एकमात्र ऐसा संगठन है जो लोगों को बरगलाने का कार्य करता है और भी बहुत सारी बाते है जो विभिन्न मत सम्प्रदाय के द्वारा कही जाती है आर्य समाज कोई मत पन्थ या सम्प्रदाय नहीं है क्योंकि यह ईश्वरिय ज्ञान वेद पर आधारित है जिसका मुख्य उद्देश्य वेद प्रचार द्वारा जनता को सच्चे वैदिक धर्म की शिक्षा देना है जैसे ईश्वर नित्य है वेद ज्ञान नित्य है आर्य समाज वेदज्ञान के आधार पर आपकी आँखों से झूठ का पर्दा हटाकर आपको सत्य सत्य जानकारी से अवगत कराने का प्रयास करता है वेद कहता है कि जो वस्तु जैसा है उसे वैसा ही मानना सत्य है जब कि वो कहते हैं कि मानो तो देव ना मानो तो पत्थर अर्थात आप पत्थर को देवता मानते हो तो वह देवता है नहीं मानते हो तो वह पत्थर है यदि कोई आपसे पूछता है कि आपसे किसने बोल दिया कि वह देवता है तो आप कहेंगे की यह बात तो परंपरा से चली आ रही है तो परंपरा भी तो गलत हो सकती है झूठी हो सकती है तो आप कहेंगे कि आप तो हमारे भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं जबकि धर्म के साथ भावना का कोई भी संबंध नहीं है आप उस भावना से झूठ को कभी भी सत्य नहीं सिद्ध कर सकते एक आदमी कहता है की जमीन पर खड़े खड़े ही उसने चांद के दो टुकड़े कर दिए तो दूसरा आदमी कहता है की हनुमान जी ने तो सूर्य को ही खा लिया फिर आप अपनी बात को जस्टिफाई करने के लिए कहते हैं की यह तो मेरी आस्था है आप गलत आस्था से किसी झूठ को सत्य में कैसे परिवर्तित कर सकते हैं यदि फिर भी आप कहते हैं मानो तो देव ना मानो तो पत्थर यह सत्य है तो आपको मुट्ठी में रेत लेकर यह भी मानना पड़ेगा कि मानो तो चीनी ना मानो तो रेत क्या यह मानकर रेत को चीनी में परिवर्तित करना आपके लिए सम्भव हो सकता है यहां आपकी आस्था कहां चली जाती है नहीं कभी भी सम्भव नहीं क्योंकि भावना के द्वारा आप कभी भी झूठ को सत्य में नहीं बदल सकते जबकि वेद भी इस तरह की बातों से साफ मना करता है वेद कहता है कि जो वस्तु जैसा है उसे वैसा ही जानना व मानना सत्य है प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 12 07 pm no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest tuesday august 13 2019 अल्लाह को कहा जाता है यालेमुल गैब यह मात्र कहने की बात है की अल्लाह अदृश्य या छुपी हुई बातों को जानता है जबकि यह सत्य नहीं है क्योकि यदि अल्लाह अदृश्य को जानता तो अपने पैगम्बर और खलीलुल्लाह पैगम्बर अल्लाह का दोस्त जिन्हें लोग इबराहीम के नाम से जानते हैं उसका इम्तिहान न लेता बताया जाता है की अल्लाह ने अपने दोस्त से इम्तिहान लेना चाहा था किस चीज की इम्तेहान ली अपने सबसे प्यारी चीज की क़ुरबानी देने की जिसे अल्लाह ने अपने दोस्त इबराहीम को ख्वाब में दिखाया था तो लगातार तीन दिन तक पशु काटते रहे अल्लाह के दोस्त इब्राहीम किन्तु अल्लाह को यह स्वीकार नहीं हुआ अल्लाह का इम्तेहान तो अभी बाकि रह गया था इब्राहिम ने फिर ख्वाब देखा की अल्लाह इब्राहीम से कह रहे हैं जो सबसे प्यारी चीज है तुम्हारी उसे मेरे रास्ते में कुर्बान करो इब्राहीम ने अपनी दासी से जो संतान पैदा किया था उसका नाम इस्माईल था उस समय तक इब्राहीम अपनी पत्नी सारा बीवी से संतान नहीं पैदा कर पाए थे इस इस्माईल को जविह उल्लाह कहा इब्राहीम ने अपनी पत्नी सारा के कहने पर इसी दासी को जिनका नाम बीवी हाजरा था घर से बाहर निकाल दिया था और बियावान जंगल में या फिर निर्जन मरूभूमी रेगिस्तान में छोड़ आये थे जहाँ पानी तक का ठिकाना नहीं माँ हाजरा और बेटा इस्माईल प्यास के मारे उस निर्जन रेगिस्तान में इधर उधर भटक रहे थे रेतीले पहाड़ पर मृग मरीचिका को पानी समझ कर सफा और मरवा नामक दो पहाड़ों के बीच में पानी के लिए वह भागती रही किन्तु वहां पानी तक नहीं मिला सात बार पानी की खोज में बिवी हाजरा दौड़ती रही जिसकी चर्चा कुरान में भी की गई हैं जैसा إِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِن شَعَائِرِ اللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ أَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ اللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ ٢ ١٥٨ बेशक कोहे सफ़ा और कोह मरवा ख़ुदा की निशानियों में से हैं पस जो शख्स ख़ानए काबा का हज या उमरा करे उस पर उन दोनो के दरमियान तवाफ़ आमद ओ रफ्त करने में कुछ गुनाह नहीं बल्कि सवाब है और जो शख्स खुश खुश नेक काम करे तो फिर ख़ुदा भी क़दरदाँ और वाक़िफ़कार है आज तक इसे हज यात्रीयों को भी करना ही पड़ता है जो बीवी हांजरा ने की थे उसी की याद करने का आदेश मुसलमानों को दिया है अल्लाह ने सवाल यह पैदा होता है की अल्लाह ने अपने दोस्त का इम्तेहाँन लिया की वह अपने बेटे को क़ुरबानी दे सकते हैं या नहीं किन्तु इस्लाम वाले यह नहीं जानते की इम्तेहान लेने वाला अल्पज्ञ होगा सर्वज्ञ नहीं हो सकता क्योंकि इम्तेहान या परीक्षा वही लेता है जो नहीं जानता है की यह क्या करता है अर्थात परिणाम जिसे ज्ञात नहीं है उसे जानने के लिए इम्तेहान ली जाती है और यही बात अल्लाह के लिए है फिर अल्लाह अदृश्य के बातों का जानने वाला कैसे हो गया दूसरी बात है की अल्लाह ने इब्राहीम को ख्वाब दिखाया की अपनी सबसे प्यारी चीज को मेरे रास्ते में क़ुरबान करो तो इब्राहीम को अपना बेटा सबसे प्यारा कहाँ था अगर बेटा इतना ही सबसे प्यारा होता तो उसे माँ के साथ घर से क्यों निकाल बाहर करता जिसे घर से बाहर पीने के लिए पानी तक नहीं दिया वह सबसे प्यारा कैसे जिसे वह पानी तक मुहैया नहीं करा सके वह प्यारा क्यों और कैसे क्या यही पैगम्बर हैं और अल्लाह के दोस्त भी यही निष्ठुरता को जिसने पशुओं को काट कर दिखाया यह बिलकुल झूठी बातें है कपोल कल्पित बातें है यह अंध विश्वासका पराकाष्ठा है उसी अंध विश्वास में आज समस्त धरती को सिर्फ धर्म के नाम पर पशुओं के खून से रंगा जा रहा है चूंकि यह पूरी घटना अल्लाह कुरान और इस्लाम से जुडी है और इसे धर्म कहकर धर्म को भी दूषित किया गया है लेकिन इस तरह के कारनामों के आधार पर यह धर्म का होना कभी भी संभव ही नहीं है कुरान में अनेक बार इस किस्से को बताया गया है समय समय पर आगे भी लिखता रहूँगा घन्यवाद के साथ महेन्द्रपाल आर्य 12 8 19 प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 12 19 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest wednesday november 14 2018 जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र बनते हैं और उनकी योग्यता के अनुसार ही हर युग मे कार्य होता है यह विशेष ध्यान रखें कि मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है मनुष्य की चार श्रेणियां हैं जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है प्रथम ब्राह्मण द्वितीय क्षत्रिय तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों प्रथम द्वितीय तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है इस लिए हर युग मे चारों का ही पूर्ण महत्व है प्रस्तुतकर्ता मदन शर्मा पर 10 12 am no comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest saturday september 28 2013 शहीद भगत सिंह क्यों आदर्श है मैं नास्तिक क्यों हूँ शहीद भगतसिंह की यह छोटी सी पुस्तक वामपंथी साम्यवादी लाबी द्वारा आजकल नौजवानों में खासी प्रचारित की जा रही है जिसका उद्देश्य उन्हें भगत सिंह के जैसा महान बनाना नहीं अपितु उनमें नास्तिकता को बढ़ावा देना है कुछ लोग इसे कन्धा भगत सिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं मेरा एक प्रश्न उनसे यह है की क्या भगत सिंह इसलिए हमारे आदर्श होने चाहिएँ कि वे नास्तिक थे अथवा इसलिए कि वे एक प्रखर देशभक्त और अपने सिद्धान्तों से किसी भी कीमत पर समझौता न करने वाले बलिदानी थे सभी कहेंगे कि इसलिए कि वे देशभक्त थे भगतसिंह के जो प्रत्यक्ष योगदान है उसके कारण भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में उनका कद इतना उच्च है कि उन पर अन्य कोई संदिग्ध विचार धारा थोंपना कतई आवश्यक नहीं है इस प्रकार के छद्म प्रोपगंडा से भावुक एवं अपरिपक्व नौजवानों को भगतसिंह के समग्र व्यक्तित्व से अनभिज्ञ रखकर अपने राजनैतिक उद्देश्य तो पूरे किये जा सकते हैं भगतसिंह के आदर्शों का समाज नहीं बनाया जा सकता किसी भी क्रांतिकारी की देशभक्ति के अलावा उनकी अध्यात्मिक विचारधारा अगर हमारे लिए आदर्श है तब तो भगत सिंह के अग्रज महान् कवि एवं लेखक भगत सिंह जैसे अनेक युवाओं के मार्ग द्रष्टा जिनके जीवन में क्रांति का सूत्रपात स्वामी दयानंद द्वारा रचित अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को पढऩे से हुआ था कट्टर आर्यसमाजी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल जी जिनका सम्पूर्ण जीवन ब्रह्मचर्य पालन से होने वाले लाभ का साक्षात् प्रमाण था क्यों हमारे लिए आदर्श और वरण करने योग्य नहीं हो सकते क्रान्तिकारी सुखदेव थापर वेदों से अत्यंत प्रभावित एवं आस्तिक थे एवं संयम विज्ञान में उनकी आस्था थी स्वयं भगत सिंह ने अपने पत्रों में उनकी इस भावना का वर्णन किया है हमारे लिए आदर्श क्यों नहीं हो सकते आर्यसमाज मेरी माता के समान है और वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य है ऐसा उदघोष करने वाले लाला लाजपतराय जिन्होंने जमीनी स्तर पर किसान आन्दोलन का नेतृत्व करने से लेकर उच्च बौद्धिक वर्ग तक में प्रखरता के साथ देशभक्ति की अलख जगाई और साइमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए वे क्यों हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते क्या इसलिए कि वे आस्तिक थे वस्तुत देशभक्त लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान रखने के लिए यह एक पर्याप्त आधार है कि वे सच्चे देशभक्त थे और उन्होंने देश की भलाई के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और सपनों सहित अपने जीवन का बलिदान कर दिया इससे उनके सम्मान में कोई कमी या व्द्धि नहीं होती कि उनकी आध्यात्मिक विचारधारा क्या थी रामप्रसाद के बलिदान का सम्मान करने के साथ अशफाक के बलिदान का केवल इस आधार पर अवमूल्यन करना कि वे इस्लाम से सम्बंधित थे केवल मूर्खता ही कही जाएगी ऐसे हजारों क्रांतिकार...
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