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parwaz परवाज़ parwaz परवाज़ ऐ प्रेम मैं तुम्हे तब तलक पढूंगी जब तक तलक तुम लिखे जाते रहोगे अगर अपना पढ़ा जाना चाहते हो तो लिखने वालों को सलामत रखो ऐ प्रेम मैं तुम्हे तब तलक लिखूंगी जब तलक तुम पढ़े जाते रहोगे अगर अपना लिखा जाना चाहते हो तो अपने करने वालों को सलामत रखो blog copywrite kanupriya inform first if you are publishing some content डैश बोर्ड मुझे जानना चाहेंगे कनु का कोना व्यंजन कनु का कोना हेल्थ टिप्स फेसबुक पेज saturday december 8 2018 सर्द आत्माएं वाइन और इश्क़ शहर सर्द नही होते मौसम भी सर्द नही होते ये सारी सर्दियां गर्म कपड़ों और आग की तपन से कम की जा सकती है सर्द आत्माएं होती हैं ये आत्माएं अपने आस पास का सारा जीवन सर्द कर देती हैं टेम्परेचर चाहे 20 हो सर्वाइव किया जा सकता है अगर चेहरे पर मुस्कुराहट और रिश्तों में ऊष्मा हो सर्द आत्माएं गर्म होने के लिए बहुत समय लेती है या दूसरी आत्मा हल्की सी कमज़ोर हो तो उसपर तारी हो जाती है दुनिया की हर भौतिक गर्म चीज़ की अच्छी बात है कि वो आपके शरीर को ठंड से बचा सकती है चाहे वो वाइन या रम हो आग हो या लिहाफ़ हो पर इनकी सबसे बड़ी कमी है कि ये आत्मा को ऊष्मा नही दे सकते इन आत्माओं का एक ही आसरा है भावनाओं की ऊष्मा पर गर्म आत्माएं अपनी ऊष्मा इन्हें देकर खुद घायल हो जाती है सुना है न्यूजर्सी के बाहरी इलाकों में एक जादूगरनी की वाइन रिफाइनरी है जहां ब्लड टिअर वाइन बनती है ये वाइन होंठो से लगाते ही सर्द आत्मा के कतरे पिघलने लगते है पर ये वाइन बनाना भी आसान नहीं और बनवाना भी नहीं आंसुओं की खेती करनी होती है जिसमे दिल के ख़ून का बीज पड़ता है रातों की नींद की खाद डाली जाती है और आंसुओं से फसल सींची जाती है फिर जो फल आता है उसे भावनाओं के बर्तन में जायफल और अदरक के रस के साथ उबाला जाता है ये वाइन एक ही घूँट में गरम पी जाती है पर बर्फ के ग्लास में पी जाती है इस बर्फ के ग्लॉस में ओक की छाल की खुशबू मिलाई जाती है कहते है ये वाइन पीना हर सर्द आत्मा के बस की बात नहीं इसकी गर्मी से मुँह में छाले हो जाते है कोई सर्द आत्मा इसे सहन नही कर पाती तो जादूगरनी उसे बर्फ का ग्लास बना देती है कि खो जाना सर्द आत्माओं की खोज में की जादू का असर हो उससे पहले लौट आना वापस की तुम मौसमों की ठंडक को आत्मा पर तारी न होने देना बचा लेना थोड़ी ऊष्मा वैसे एक उपाय और भी है इश्क़ कर लो पर जादू उसका भी कम नहीं वहाँ भी बेखुदी है kanupriyakahin newjersy wine love hindi jaadu ishq आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी posted by kanu at 11 00 am 8 comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest thursday december 6 2018 मंटो पूरे हीरो की अधूरी कहानी manto movie review फ़िल्म मंटो डायरेक्टर नंदिता दास राइटर नंदिता दास स्टार कास्ट नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी रसिका दुग्गल ताहिर राज भसीन राजश्री देशपांडे सिनेमेटोग्राफी कार्तिक विजय सेट डिज़ाइनिंग रीता घोष आर्ट डायरेक्शन राजेन्द्र चौधरी स्टिल फोटोग्राफी आदित्य वर्मा मंटो देखने से पहले जिन लोगो ने मंटो को नही पढ़ा है उन्हें मंटो को पढ़ लेना चाहिए और जिन लोगो ने पढ़ा है उन्हें एक बार और थोड़ा समझने की कोशिश करनी चाहिए और अपने मन मे फ़िल्म को लेकर खड़ी हुई बड़ी बड़ी उम्मीदों को थोड़ा सा कम कर लेना चाहिए क्योंकि फ़िल्म अच्छी है पर उम्मीद के हिसाब से बेहतरीन नही है इसे बॉयोपिक होने के कारण थोड़ी छूट दी जा सकती है पर इतनी छूट भी नहीं दी जा सकती कि उम्मीद पूरी न होने पर बायोपिक कहकर पल्ला झाड़ लिया जाए रिव्यू की शुरुवात नेगेटिव नरेटिव से करना उतना ज़रूरी नहीं था पर रिव्यू पढ़ने के बाद आपको शायद मेरी बात से इत्तेफाक हो डायरेक्शन नंदिता दास को डायरेक्शन के पूरे नंबर दिए जाने चाहिए क्योंकि जो जितना दिखाया गया है उसका हर हिस्सा बेहतरीन है उनने कलाकारों से बेहतरीन काम करवाया है हर सीन में जान है हाँ एक जगह थोड़ी सी चूक हुई है कि फ़िल्म कई जगह थोड़ी ज्यादा स्लो हो जाती है फ़िल्म के शुरुआती कुछ सीन कन्फ्यूजिंग है जो लोग मंटो को जानते हैं पढ़ते रहे हैं उनने समकालीन लेखकों को भी पढ़ा होगा पर जिनने मंटो को ज्यादा नहीं पढ़ा उन्हें एक साथ इतने लेखक किरदारों से मिलवाना टाला जा सकता था बाकी डायरेक्शन अच्छा है कई जगह बहुत अच्छा भी कांसेप्ट और कहानी किसी फिल्म रिव्यु में कॉन्सेप्ट की बात होनी ही चाहिए जब वो फ़िल्म की कमज़ोर कड़ी में से एक हो आप बायोपिक केटेगरी में फ़िल्म बना रहे है पर उसे रिलीज़ तो कमर्शियल सिनेमा की ही तरह कर रहे हैं तो सिर्फ 4 साल की कहानी लेकर फ़िल्म क्यो बनाई जाए ये सही है कि मंटो को एक फ़िल्म में बांधना मुश्किल है पर सिर्फ चार साल ही क्यों इसलिए कि वो चार साल भारत पाकिस्तान के बटवारे का समय था और मंटो के ज़हन पर उनकी कहानियों पर उस दौर का गहरा असर था पर आप अगर मंटो फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखा रहे हैं तो कांसेप्ट पर और काम किया जाना बनता ही था मंटो को सिर्फ उन चार सालों में बांध देना खलता है खलने से ज़्यादा ये अधूरापन लगता है जिन लोगो ने मंटो को पढ़ा है उन्हें भी लगेगा और जिनने नही पढ़ा उन्हें तो लगेगा ही फ़िल्म की कहानी दूसरी कमज़ोर कड़ी है कहानी जैसा कि कॉन्सेप्ट अधूरा है उसी तरह कहानी भी अधूरी सी लगती है मंटो उन चार सालों से ज्यादा बहुत ज्यादा है दूसरी बात मंटो ने बस बंटवारे के आस पास कहानियां नही लिखी उनकी कहकनियों में वैश्याओं की कहानियों का पीड़ित औरतों की कहानियों का भी बड़ा हिस्सा है जो फ़िल्म में एक कहानी दिखाकर और एक दो डायलॉग बुलवाकर खत्म कर दिया गया है जो कहानी दिखाई गई वो भी उन लोगो को कतई क्लिअर नही होगी जिनने मंटो को पढ़ा नहीं टोबा टेक सिंग और ठंडा गोश्त मंटो की प्रतिनिधि कहानियां हैं और इन्हें बहुत बेहतरीन ढंग से फ़िल्म में गूँथा गया है पर पाकिस्तान में मुकदमे वाला हिस्सा काफी लंबा खींचा गया है काली सलवार खोल दो बारिश बू सड़क के किनारे खुदकुशी जैसी कई कहानियां जिक्र से महरूम रह गई इसे राइटर की मजबूरी समझ जा सकता है कि एक फ़िल्म में सब कैसे डाला जा सकता है पर एक राइटर जिसपर फ़िल्म बनी है उसकी जिंदगी के कुछ और पहलू उजागर किए जाने चाहिए थे ये फ़िल्म मंटो पर बननी चाहिए थी पर ये उनकी कहानियों पर बनी मंटो अपनी कहानियों से अलग भी है आपने मंटो बनाई है मंटो 1 नहीं जिसके आगे आप पार्ट 2 3 भी लाने वाले हैं 1 मंटो बनाकर आप अधूरापन कैसे रख सकते हैं कहानी में थोड़ी और रिसर्च थोड़ा और बढ़ा हुआ दायरा थोड़ी और कसी हुई कहानी और स्क्रिप्ट इस फ़िल्म की मांग थी जो पूरी नही हुई है अभिनय अभिनय के मामले में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने हमेशा की तरह कमाल किया है उन्हें मंटो मान लेने को दिल चाहता है हर भाव किरदार का हर रंग चाल ढाल सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कभी मंटो को न देखकर भी हम मंटो को ही देख रहे हैं लत की हद्द तक शराब में डूब जाना विद्रोह की हद तक विद्रोह करना मोहब्बत की हद तक बम्बई आज की मुम्बई के इश्क़ में डूब जाना सब मंटो को सामने ला खड़ा करता है रसिका दुग्गल ने मंटो की शरीके हयात का किरदार बखूबी निभाया है मोहब्बत चिढ़ साथ और अपने ही शौहर की कभी प्रशंसक और कभी मजबूर बीवी और बच्चो की माँ होने की कशमकश उनके किरदार में उभरकर आई है ताहिर राज भसीन ने श्याम के किरदार को बड़े अच्छे से निभाया है और राजश्री देशपांडे इस्मत चुगतई ने भी अच्छा अभिनय किया है भानु उदय अशोक कुमार का किरदार इला अरुण जद्दन बाई भी आकर्षित करते है नरगिस का रोल करने वाली अदाकारा भी और बेहतर कर सकती थी पर उन्हें वो रोल दिया ही नहीं गया जो मंटो की कहानी में नरगिस का होना चाहिए था खैर उसे नज़रंदाज़ किया जा सकता है सिनेमेटोग्राफी और सेट बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी स्टिल फोटोग्राफी और उस दौर को सामने ला खड़े करने वाले सेट कई जगह आपको ऐसा लगेगा कि आप वही है उसी दौर में उस दौर के स्टेशन पर उस दौर की लोकल ट्रेन में उस समय के लाहौर में उन घरों में उन गलियों में उन दवाओं के पास बैठे हुए उस समय की किसी फिल्मी पार्टी में या उस समय के शराबखाने या मैग्ज़ीन के ऑफिस में आर्ट डाइडेक्टर का काम भी बहुत अच्छा है और रीता घोष ने जीवंत सेट बनाए है कपड़ो से लेकर मेकअप तक सब आपको उस दौर में ले जाता है जो दौर हमने देखा नहीं वो नज़र के सामने हो जैसे फ़िल्म क्यों देखे ऐसी फिल्में देखी जानी चाहिए क्योंकि ये उस लेखक की कहानी है जो अपने हर लिखे पर तोहमतें उठाता रहा मुकदमे झेलता रहा फिर भी उसने वो लिखा जो आईना था समाज का अच्छे लेखकों को जान लेना अच्छी बात है और कुछ नही तो जिनने मंटो को पढ़ा नही वो ये फ़िल्म देखकर पढ़ने लगे शायद और अपने लिए मंटो की उस दुनिया के दरवाज़े खोल ले जिससे अछूता रहना कोई बड़ी अच्छी बात नहीं फ़िल्म इसके सेट उस दौर की बंटवारे कि दास्तान उसके आम लोगो पर और एक ऐसे लेखक पर पड़े प्रभाव के लिए भी देख सकते हैं जो लाहौर तो गया पर दिल बम्बई में छोड़ गया और फिर और अपने दिल की पुकार पर दो देशों में बंट गया यहाँ का रह न सका वह का हो न सका फ़िल्म क्यों न देखें ये बायोपिक है और अधूरी है इसलिए पहले मंटो को थोड़ा पढ़े और फिर देखने जाए दूसरी बात मंटो सुनकर जो लोग ये उम्मीद लगा बैठे हो कि फ़िल्म में ज्यादा खुलापन होगा मंटो की कहानियों को कुछ लोग इसलिए बुरा भी मानते रहे है इसी खुलेपन की वजह से वो न जाए मंटो को बेहद चाहने वाले बड़ी बड़ी उम्मीदें लेकर न जाए 4 साल की अधूरी कहानी में आपको पूरे मंटो नही मिलेंगे पर अफसोस जताने जैसा भी कुछ नहीं एक लेखक पर फ़िल्म बनी है देख लेने में बुराई नहीं पर मंटो को पूरा नही पाएंगे अच्छा अभिनय देखना है देख लीजिए बाकी कहानी में कमजोरी कॉन्सेप्ट में कमजोरी और कहीं कहीं बोरियत आप ख़ुद महसूस करेंगे हाँ अपने प्यारे लेखक को किरदार के रूप में देखना अच्छा लगेगा मंटो पर बनी इस फ़िल्म को 3 स्टार पर तसल्ली रख लेनी होगी ये प्रेम कहानी नहीं ना ही कोई परिकथा जो सिर्फ अच्छे सेट या डायरेक्शन से नैया पार हो स्क्रिप्ट में और कसावट ज़रूरी थी kanupriyakahin mantomoviereview manto nanditadas mantomovie आपका एक कमेन्ट मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा देगा और भूल सुधार का अवसर भी posted by kanu at 9 54 pm 1 comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest tuesday july 3 2018 कितना मुश्किल होगा सोचो फिर से बच्चा हो जाना हम बच्चा हो जाने की हसरत तो करते रहते हैं कितना मुश्किल होगा सोचो फिर से बच्चा हो जाना ये ऐसे करना होगा वो वैसे पढ़ना होगा ऐसे तुमको हँसना होगा ऐसे तुमको डरना होगा ऐसे नई चीज़ें सीखो अपने ढंग से नहीं करो कितनी चिढ़ाता होगा हर बात पर टोका जाना कितना मुश्किल होगा सोचो फिर से बच्चा हो जाना ये करके दिखलाओ चलो अभी गाना गाओ खाओ खाना जल्दी से सबको देखो मुस्काओ नाच नया दिखलाओ न नई पोयम सुनाओ ना सबका मन बहलाना जैसे बंदर बन जाना कितना मुश्किल होगा सोचो फिर से बच्चा हो जाना माँ की गोदी में खेलने का मन पर कैसे कह पाए डर लगता है अंधेरे से कैसे बोलो बतलाएं मन की बात कह भी दे तो समझने को कोई तैयार नहीं उम्मीदें इनसे ज्यादा है ये जैसे हैं स्वीकार नहीं कौन सुनेगा इनकी बातें कौन सुनेगा अफ़साना कितना मुश्किल होगा सोचो फिर से बच्चा हो जाना posted by kanu at 12 10 pm 3 comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest labels bacche children kanupriya parwaz kids wednesday april 4 2018 मुझे तन्हाइयां बख्शो मुझे तन्हाइयां बख्शो कहीं इस शोर से आगे अंधेरे घोर के आगे जो पल पल कसी जाए गले की डोर के आगे मुझे तन्हाइयां बख्शो मुझे तन्हाइयां बख्शो मैं उतना ही अकेला हूँ जितना सीप में मोती मेरी चाहत में सब पागल मुझे कुछ भी नहीं हासिल मेरी आँख डरती है रोशनी के बवंडर से चमकता हूँ ज़माने में डरा बैठा हूँ अंदर से कर लो दूर ये चाहत मुझे रुसवाईयाँ बख्शो मुझे तन्हाइयां बख्शो तेज़ कदमों की आहट से ये मेरा दिल धड़कता है है इतना दर्द क्यों फैला सोचता है तड़पता है जो तुमने आग फैलाई नए नए बहाने से लपट इतनी लगी गहरी साँस डरती है आने से तुम अपना मुखोटा रख लो मुझे सच्चाइयां बख्शो इन ज़हरीली बातों से मुझे तन्हाइयां बख्शो क्षितिज की आस में चलते मेरे पाँवों में छाले हैं मेरे मन में बवंडर है कई बरसों से पाले हैं ये सारी मरीचिका है मैं जानता हूँ सब आंख पर झूठ का पर्दा उसी को मानता हूँ सब मशीनों सा चला जाऊं मुझे अंगड़ाइयां बख्शो भीड़ में खो रहा हूँ मैं मुझे तन्हाइयां बख्शो posted by kanu at 1 23 pm 5 comments email this blogthis share to x share to facebook share to pinterest labels hindisong kanupriyakahin song older posts home subscribe to posts atom blogjunta editors choice total pageviews followers feedjit feedjit live blog stats my indi blogger rank indiae we are in indiae in maharashtra proud to be an indi blogger भास्कर भूमि में परवाज़ 24 july 1 august 8 august 10 august 11 august 25 august 30 august 2012 page number 8 bloggari kanu kanupriya blog archive 2018 4 december 2018 2 सर्द आत्माएं वाइन और इश्क़ मंटो पूरे हीरो की अधूरी कहानी manto movie review july 2018 1 april 2018 1 2017 4 november 2017 3 august 2017 1 2016 1 september 2016 1 2015 4 march 2015 2 january 2015 2 2014 5 june 2014 1 april 2014 3 january 2014 1 2013 16 october 2013 1 august 2013 2 july 2013 3 may 2013 2 april 2013 3 march 2013 2 february 2013 2 january 2013 1 2012 60 december 2012 2 october 2012 1 september 2012 7 august 2012 11 july 2012 9 june 2012 3 may 2012 4 april 2012 4 march 2012 4 february 2012 6 january 2012 9 2011 81 december 2011 8 november 2011 10 october 2011 9 september 2011 9 august 2011 9 july 2011 17 june 2011 10 may 2011 8 january 2011 1 2010 3 october 2010 1 august 2010 2 2009 14 december 2009 1 october 2009 2 august 2009 1 july 2009 10 आपने पसंद किया समय की पालकी सर्द आत्माएं वाइन और इश्क़ दम लगा के हईशा तुमसे मिले दिल में उठा दर्द करारा dam laga ke haisha movie review और तुम मुझसे मोहब्बत कर बेठे why you love me भूख बस एक आवाज़ सुनती है रोटी की आवाज़ साथ नहीं छोडूंगी मैं तन्हाई में ये शहर पराया लगता है बेटियों की शादी और मायका गणेश जी मुंगडा ओ मुंगडा से जन्नत की हूर तक परवाज़ के साथी स्वप्न मेरे www udanti com fashion studio सुबीर संवाद सेवा sehar नीरज प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ scrutiny आज की ग़ज़ल चर्चामंच न दैन्यं न पलायनम् रजनीश का ब्लॉग शेफ़ा कजगाँवी شفا کجگاونوی भड़ास blog प्राची के पार बैरंग अमृता प्रीतम की याद में अष्टावक्र bbc ब्लॉग style bungalow hindi literature hindi site hindi news hindi poems स्वर्गविभा हिन्दी साहित्य वटवृक्ष नवभारत टाइम्स रीडर्स ब्लॉग copyright kanupriya gupta please dont use any content without information or permission picture window theme theme images by wingmar powered by blogger
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