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ध्या को भी रहा लगातार किट्टू को पुकारते घूमे लेकिन उधर से कोई जवाब न आया तीसरा दिन पूरे घर मे बेचैनी और उदासी छा रही थी लेकिन बेटी के आ जाने के बाद निराशा के अंधेरे में संकल्प के नए बीज बोए गए हमे पता था कि किट्टू ने जंगल में कुछ नहीं खाया होगा पानी भी मिलना दूभर होगा और उसे खोजा नहीं गया तो अधिक दिन नहीं बचेगी हमने संकल्प किया कि अपनी शक्ति भर खोज जारी रखेंगे तीसरे दिन तक अनुमान हो गया कि बिना किसी सूत्र के हाथ लगे इतने बड़े क्षेत्र में उसे खोज पाना असम्भव है जब कि उसके किसी भी ओर चले जाने की संभावना थी हमने नई रणनीति तय किया और नए रंगीन स्टिकर वाले पोस्टर तैयार करवाए और हर संभावित क्षेत्र में देर रात तक पोस्टर लगते और लोगों से बातें करते रहे लोग सुन कर चकित भी होते आश्वासन भी देते लेकिन उसे तीसरे दिन तक किसी ने कहीं नहीं देखा तीसरे दिन एक घर से सूचना मिली कि एक बिल्ली हमारे बाथरूम की छत पर बैठी थी लगभग हुलिया वैसा ही बताया तो हमारा उत्साह बढ़ गया खोज की सुई को पहली बार एक दिशा मिली लेकिन उस दिन हम बिना किसी परिणाम वापस नोएडा आ गए चौथा दिन चौथे दिन की एकदम सुबह एक फोन आया कि बिल्ली वहीं एक घर मे देखी गई है हम पूरी तेजी से कार दौड़ाते हुए बीस मिनट में नोएडा से वसुन्धरा लगभग 18 किलोमीटर पहुँच चुके थे लेकिन तब तक बिल्ली वहाँ से जा चुकी थी उनके बताए विवरण ने हमें आशा से भर दिया और हमने उस स्थान पर खाना छोड़ने के साथ लिटर बिल्ली के नित्य क्रिया के लिए एक विशेष मिट्टी भी छिड़क आए उसी दिन संध्या को फिर खोज चालू हुई लेकिन बिल्ली का कोई अता पता नहीं इसी बीच वसुन्धरा कॉलोनी में पैदल भटकते हुए किसी ने बताया कि सामने वाले पार्क में अभी अभी बिल्ली देखी गई है हम भागे उस ओर पार्क छान मारा एक बिल्ली दिखी सफेद और बादामी रंग की परन्तु वो किट्टू नहीं थी अब हम फिर दिशाहीन अँधेरे में थे पाँचवाँ दिन कल किसी और बिल्ली के मिल जाने से हम निराशा के गर्त में गोते लगाने लगे थे निराशा के साथ साथ हताशा ने भी घेरना चालू कर दिया कोई सूत्र हाथ नहीं लग रहा था समझ नहीं आया कि हज़ारों लोगों की बस्ती में किसी ने एक लावारिस बिल्ली को भटकते क्यों और कैसे नहीं देखा जबकि एक बिल्ली के खोने के इतने पोस्टर अब मुहल्ले में चर्चा का विषय बन चुके थे पाँचवें दिन की सुबह भी इधर उधर भटकते ही बीत गई हमने हाइवे के दूसरीं ओर फैक्ट्री के बड़े बड़े आहातों और शेडों को भी छान मारा कई कई बार हाइवे की ढलान पर उगे बरसाती घास के झुरमुटों को छान मारा अब हमें लगने लगा कि किट्टू कहीं किसी घर मे शरण ले चुकी होगी जिसको खोज पाना अब सम्भव नहीं लग रहा था सुबह भटक कर हम वापस आ गए और लगभग सोच लिया कि आज शाम और खोजेंगे नहीं तो न चाहते हुए खोज बन्द करने का निर्णय लेना ही पड़ेगा क्योंकि अब तक हमारे हाथ एक भी सार्थक सूत्र नहीं लगा था और हम पूरी तरह दिशाहीन थे सन्ध्या को हम फिर वसुन्धरा लौटे देर रात तक गलियों में भटकते रहे पार्श्वनाथ सोसाइटी को हमने ये मान कर छोड़ दिया था कि उधर इतने पोस्टर लगे हैं कि कोई न कोई फोन आएगा ही उस रात हम पूरी तरह से निराशा की गर्त में लगभग डूब ही चुके थे ईश्वर से प्रार्थना करते हुए झुके कन्धों के साथ हम उस दिन खोज समाप्त कर लौट ही रहे थे कि ईश्वर की ओर से प्रज्ञा हुई कि एक बार जंगल के बीच मे बैठे igl के गार्डों से मिल लेना चाहिए रात के शायद 9 बजे जंगल में अँधेरा होने के बाद भी हम गार्ड के पास गए तो गार्ड हमें देखते ही चौंका और कहा कि मैंने कल शाम एक सफेद बिल्ली इसी जंगल मे भटकती हुई देखा है वो कूड़े के ढेर के पास बैठी थी पकड़ने की कोशिश पर भाग गई उसके बताए हुलिए से हमें रोमांच हो गया फिर से आशा की किरण कौंध गई कि ये किट्टू ही थी और अब तक जंगल मे ही भटक रही है किसी घर मे जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है अब हमने खोज को नए सिरे से करने का निर्णय लिया और रात में खोज करने की नई योजना बनाई छठा दिन छठे दिन सुबह 3 00 बजे मैं और बेटी जंगल और वसुन्धरा सेक्टर के सन्धि वाली लेन पर पहुँच चुके थे उस दिन भयंकर उमस और गर्मी थी कार चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था हम कार की अगली सीट को नीचे कर लेटे हुए पौ फटने की प्रतीक्षा कर रहे थे लेकिन मन मे उद्विग्नता भी थी और आशा भी इतनी सुबह पूरे सेक्टर में सन्नाटा छाया हुआ था अचानक मुझे फिर प्रज्ञा हुई कि उठो हमने उठ कर जंगल के किनारे किनारे चक्कर काटने का मन बनाया और उठ कर घूमने लगे जंगल के किनारे चलते चलते टॉर्च का प्रकाश भी अँधेरे के लिए अपर्याप्त ही था किन्तु अब हमारे पास एक दिशा थी आज हम उस जंगल को छान मारने के दृढ़ संकल्प के साथ आए थे उस समय सुबह के लगभग साढ़े चार बज रहे थे हम टहलते हुए गली से निकल कर हाइवे की ओर लगभग मुड़ चुके थे जहाँ से जंगल समाप्त हो जाता था और कुत्तों से भरा मीट की दुकानों वाला क्षेत्र आ जाता था उधर इतने कुत्ते होते थे कि उधर होने की बहुत कम संभावना थी तभी अचानक बेटी हल्का सा ठिठकी उसे देख मैं भी रुक गया भोर की नीरवता में हल्की और बेहद क्षीण म्याऊँ की ध्वनि पहली बार तो हमें भ्रम लगी किन्तु दोबारा हम सचेत हो चुके थे और ध्वनि दोबारा कान में पड़ते ही हम सचेत हो गए और आवाज़ का अनुमान कर वापस दौड़ पड़े इस बीच उसने कई बार हमें आवाज़ लगाई और हम उस दिशा में वापस बढ़ते रहे हम पहले उसके पास से ही निकले थे और वो घास के झुरमुटों से हमें देख चुकी थी और हमारी बातों से हमें पहचान भी चुकी थी पर उसे लगा हम उसे बुला लेंगे लेकिन न हम उसे देख पाए थे न बुलाया तो उसने स्वयं ही हमें बुलाया कि मैं यहाँ हूँ हम जैसे ही वापस लौटे लगभग 10 मीटर दूर घास के झुरमुटों से निकल कर किट्टू हमारे सामने खड़ी थी मैं रोमांचित हो उठा बिटिया चीख उठी थी ये किट्टू ही है किट्टू ही है और अनायास मैं वहीं बैठ गया और मेरे मुँह से निकला आजा मेरे बच्चे आजा मेरे बच्चे और वो दौड़ कर आई और गोदी में समा गई भाग कर हम कार में पहुँचे डिब्बे से कैट फ़ूड निकाला तो वो टूट पड़ी पाँच दिन से उसने कुछ नहीं खाया था जंगल मे ही छुपी रही बरसात भी हुई गर्मी भी थी अँधेरा और तमाम कुत्तों का डर भी था लेकिन वो किसी तरह बच गई किट्टू अपने घर आ गई किन्तु उसमे कई परिवर्तन आ गए अब थोड़ा गम्भीर हुई है हमसे उसका जुड़ाव और बढ़ गया है लेकिन अनजान लोगों से डरने लगी है पेड़ पर चढ़ते हुए उसके सारे पंजे घिस गए हैं लेकिन किट्टू के प्रति स्नेह के अंकुर अब और प्रगाढ़ हो चुके हैं किट्टू की खोज ने कहीं न कहीं हमें अपने आप को भी खोजने को विवश किया अपना स्नेह अपना धैर्य अपना संकल्प और अपना संघर्ष और बहुत कुछ मिला इस खोज में rate this padmsingh 10 08 am on october 19 2017 क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी संघर्षों का फल लाएगी स्वप्न बंधे जंजीरों में आशाएं कुंठित रुद्ध भले होँ आज समय विपरीत सही विधि के निर्माता क्रुद्ध भले होँ स्वेद लिखेगा आने वाले कल को बाज़ी किसकी होगी झंझावात रुके हैं किससे राहें होँ अवरुद्ध भले होँ जाग पड़ेंगे सुप्त भाग्य कुछ ऐसा कोलाहल लाएगी क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी संघर्षो का फल लाएगी हमने सीखा नहीं समय से डर जाना घुट कर मर जाना क्रान्ति और संघर्ष रहा है परिवर्तन का ताना बाना दुर्दिन के खूनी पंजों से खेंच सुपल फिर वापस लाना ठान लिया तो ठान लिया पाना है या कट कर मर जाना थर्रायेंगे दिल दुश्मन के वो भीषण हलचल लाएगी क्रांति सुनहरा कल लाएगी संघर्षों का फल लाएगी याचक बन कर जीना कैसा घुट घुट आंसू पीना कैसा रोशन होकर ही जीना है धुवाँ धुवाँ कर जीना कैसा घात लगा कर गलियों गलियों गद्दारों की फ़ौज खड़ी है तूफानों से घबरा जाए वो भी कहो सफीना कैसा हर पगडण्डी राजमार्ग तक आज नहीं तो कल लाएगी क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी संघर्षों का फल लाएगी rate this padmsingh 2 46 am on july 2 2017 जीवन और स्मृति वो पहला दिन था जब मैं त्रिभुवन जी की साइकिल के आगे डण्डे पर बैठ कर स्कूल पहुँचा था स्कूल के ही दो कमरे ब्लॉक ऑफिस के काम आते थे तो कुछ लोहे की सरकारी रंगीन बैलगाड़ियाँ स्कूल में ही खड़ी थीं 25 पैसे फीस होती थी उस समय पहली क्लास की चन्द पन्नों की एक ही किताब हिन्दी बाल पोथी महुए के पेड़ के नीचे बैटरी की कालिख से लकड़ी की पट्टी काली करना और सुलेख लिखना महुए के पेड़ पर जहरीली चींटियां और 3 पैसे की एक पुड़िया लकी स्याही सब इतना स्पष्ट याद है कि लगता है कल की बात है पहली क्लास में एक लड़की शायद सुशीला नाम था मेरे से कुछ बड़ी थी उसके साथ रहना मुझे बहुत सुखद लगता था अक्सर हम घर से लाए पराँठे आपस मे शेयर भी करते साथ साथ स्कूल के पिछवाड़े वाले बाग में घूमते और झरबेरी खाते अब सोचता हूँ तो लगता है क्या उस उम्र में भी कुछ प्यार व्यार जैसा तो नहीं रहा होगा लगभग 40 साल के इस अन्तराल में अगर वो याद रह गयी है तो कुछ विशेष तो थी ही आज एक लम्बा समय निकल चुका है देखते देखते लगभग 45 साल सर्र से निकल गए सुबह शाम सुबह शाम बहुत कुछ स्मृति में शेष है ट्रिलियन ट्रिलियन डेटा मस्तिष्क तन्तुओं में सोया पड़ा है तमाम ऐसी घटनाएँ जिन्हें हम खुद ही याद नही करना चाहते लेकिन याद रह जाती हैं बहुत से ऐसे पल जो समय की धूल में अदृश्य हो चुके हैं कभी सोच कर देखिये आपकी स्मृति बचपन में कितने पीछे तक जा पाती है क्या आपको माँ की गोद याद है क्या याद है कि आपके बचपन के सबसे पुराने खिलौने क्या थे मुझे लगता है मैं अपने बचपन के तीसरे साल तक की स्मृति में जा सकता हूँ ओशो कहते हैं अपने पूर्व जन्म की स्मृति में जाना सम्भव है यहाँ तक कि बचपन के 6 माह तक बालक को अपने पूर्व जन्म की स्मृति होती है समस्या यह है कि स्मृति में पीछे जाना टेप को उल्टा बजाने जैसा है अगर हम स्मृति में पीछे जा भी पाए तो समझ पाना सम्भव नही होता थोड़ी स्मृतियाँ जो टुकड़ों में रह जाती हैं वो टेप को रिवर्स कर के फिर सीधा बजाने जैसा है मनोविज्ञान में स्मृति एक पूरा विषय ही अलग है स्मृति के विषय में आपकी अभिरुचि सम्वेदना अभिप्रेरणा ही नही चेतन और अचेतन में पड़ी इच्छाएँ और अनुभव भी प्रभावित करते हैं तो एक बार प्रयास करिये आप अपने बचपन मे कितना पीछे जा सकते हैं अपना पहला स्कूल का दिन उससे पहले के दिन या उससे भी पहले आप देखेंगे कि आपके अनुभव बदल गए समझने की क्षमता बढ़ गयी रुचियाँ स्वभाव प्राथमिकताएं सब बदलीं लेकिन आप लगभग आज भी वैसे ही हैं गौर से देखिये जो द्रष्टा है उसमें कोई परिवर्तन नही है धीरे धीरे चलते हुए वर्तमान में आइए द्रष्टा भाव से वरना आप उदास हो सकते हैं और फ़िर अगले पाँच साल आगे जाइये दस साल पन्द्रह साल या बीस पचीस साल आगे जाइये और स्वयं को देखिए आप कहाँ होंगे आप का शरीर कहाँ होगा लेकिन ज़रूरी है हर घटना सम्भावना की आँख में आँख डाल कर स्पष्ट देखने का प्रयास करना संभव है आप स्थितप्रज्ञ हो जाएं rate this padmsingh 5 20 pm on may 22 2017 हिन्दू समाज को बांटने की राजनीतिक साजिश है सहारनपुर दंगे rastra sandesh दंगों की आग झेल रहा सहारनपुर सतही तौर पर भले ही दलितों और ठाकुरो के बीच की जातीय हिंसा लगे पर इसकी तह पर बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश की बू आती है हज़ारों वर्षो के भारतीय इतिहास को अगर पलट कर देखे तो आप पाएंगे कि आज़ादी के 70 वर्षो बाद पहली बार ऐसा लग रहा था कि पूरा देश हिंदुत्व के साये में जातीय बेड़ियों को तोड़कर एकता के गठबंधन में बंधकर एकता के रास्ते पर अग्रसर होना चाहता है पर इससे पहले की इस गठबंधन को मजबूती मिलती हैदराबाद विश्वविद्यालय से रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर आती है और राष्ट्रीय पटल पर यह चर्चा का विषय बन जाता है कि देश में दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और उन्हें इस प्रकार से शोषित किया जा रहा है कि उन्हें आत्महत्या पर विवश किया जा रहा है इस पर जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक वामपंथी view original post 353 और शब्द rate this padmsingh 11 22 am on april 11 2017 दिल्ली सोशल मीट 11 4 16 फेसबुक वारियर्स दिल्ली मीट लोग कहते थे आग बुझ गयी है राख़ है ये जरा कुरेद के देखा तो मशालें निकलीं ये शे र लिखते हुए मैं उम्मीद और नए उत्साह से भर जाता हूँ सोशल मीडिया को निरा लफ़्फ़ाज़ी मञ्च और हवा हवाई कहने समझने वालों के लिए यह समझ लेना चाहिए कि वैचारिक क्रान्ति की जो जाग हुई है वो एक दिन आग भी बनेगी और जो समझते हैं यहाँ खून नहीं पानी है उनसे कह दूँ के ये दरिया बड़ी तूफानी है दिल्ली मे हुई मीट को मैं एक करवट के रूप मे देखता हूँ एक मीटिंग से कोई निष्कर्ष निकल सकता था ऐसा मानना भी नहीं था आभासी दुनिया से निकाल कर विचार जब सड़कों पर निकल पड़ें तो ये उस करवट की निशानी है जो सुबह की उजास के साथ जाग मे बदलेगी उस चिंगारी की निशानी है जो एक दिन आग मे बदलेगी पिछले लगभग दो सालों से देश मे एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दे अप्रासंगिक हो गए हैं बहस के आयाम बदल गए हैं दशकों से छुपे हुए तमाम मकोड़े अचानक बिलबिला कर बिलों से बाहर आ गए हैं एकजुट हो रहे हैं दाँव पर दाँव खेल रहे हैं और ऐसे विरोध के अतिरेक मे जिस डाल पर बैठे हैं वही काटने को उतारू हो रहे हैं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं ऐसे मे वो कहीं न कहीं बहुत दिनों से सोए पड़े दूसरे धडे को भी झकझोर रहे हैं जागने को मजबूर कर रहे हैं दिल्ली मीट इसका एक उदाहरण है दिल्ली मीट बहुत organized नहीं थी बहुत व्यवस्थित भी नहीं थी एजेंडा भी बहुत स्पष्ट नहीं था कुछ लोग बोले कुछ लोग चाह कर भी नहीं बोल पाए मुद्दा jnu और मीडिया जैसे मुद्दों और समस्याओं की खोज के गोल दायरे मे घूमता रहा वास्तव मे ऐसी मीटिंग्स से बहुत बड़ा परिवर्तन होने वाला है ऐसा भी मैं नहीं मानता ऐसे तमाम मिलन बैठक मीटिंग्स हम रोज़ करते हैं मन मे जज़्बा भी है जुनून भी है और ज़रूरत भी है लेकिन हर बार एक कसमसाता हुआ सवाल सामने आ खड़ा होता है आखिर हम करें तो क्या करें लड़ाई के हजारों छोटे बड़े मोर्चे हैं कि शुरुआत कहाँ से करें कैसे करें और किसके खिलाफ़ करें लेकिन जब हम आभासी दुनिया से निकल कर आमने सामने मिलते हैं तो उसके मायने बदल जाते हैं जब हम एक साथ बैठते हैं तो हमारी तमाम सोच तमाम ऊर्जा और शक्ति जो अलग अलग दिशाओं मे बहती है उसको संगठित होने और एक दिशा पाने का अवसर मिलता है और एक प्रश्न भी मिलता है who am i टाइप का हम अपनी स्थिति कुछ और स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं ऐसे मिलन और होने चाहिए हजारों की संख्या मे होने चाहिए अपने अपने क्षेत्र मे कम से कम सभी वैचारिक समझ रखने वाले लोग आपस मे एक दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जाने समाधान परिवर्तन और परिणाम इसके बारे मे तुरन्त आशा करना व्यर्थ है अन्ना आंदोलन जैसे दूध के उफ़ान बनने से कुछ नहीं होगा बाबा रामदेव जिसे मिर्ची लगे वो इससे बड़ा योग आयुर्वेद और स्वदेशी का काम कर के दिखा दे जैसे दूरदर्शी और सुव्यवस्थित सोच के साथ बढ़ना होगा सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य है अपनी अपनी विशेषज्ञता लेकिन लक्ष्य एक है बाकी सब गौण हैं साधन अनेक हैं साध्य एक है यही सोच रखेंगे तो सब अच्छा होगा अंत मे शुभेक्षा के साथ कुछ बिन्दु आगे होने वाली मीटिंग्स के लिए छोडना चाहूँगा 1 आगे के मिलन किसी बन्द स्थान मे रखे जाएँ मंदिर सभागृह स्कूल 2 पहले से चर्चा का एक विषय तय हो तो अच्छा होगा 3 चर्चा के मुख्य विषय पर कुछ विशेषज्ञ भी हों 3 सभी स्वयं का परिचय कराएँ सभी एक दूसरे को कम से कम पहचानें 4 विचार के लिए फेसबुक पहले से है मीटिग् मे अपने क्षेत्र मे मित्रवत संगठन या ग्रुप्स पर विशेष ज़ोर हो 5 यह तय हो कि यदि आवश्यक हुआ तो उस क्षेत्र के फेसबुक वारियर्स अल्प समय मे कब कहाँ और कैसे मिलेंगे बहुत कुछ है दो लाइन लिखने वाले से इतना लिखवा लिया ज़्यादा ज्ञान तथाकथित देने से कोई फायदा नहीं है लगे रहिए जूझते रहिए हार नहीं माननी और भाई अजीत सिंह की तरह कहूँ तो छोड़ो पोस्ट की ऐसी तैसी नहीं करानी ज़िन्दाबाद फेसबुक वारियर्स ज़िन्दाबाद 28 585116 77 332893 rate this padmsingh 4 45 am on april 7 2017 धूप सवेरे ही शाम का मज़मून गढ़ जाती है धूप एक सफ़हा ज़िन्दगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप लाँघती परती तपाती खेत घर जंगल शहर धड़धड़ाती रेल सी आती है बढ़ जाती है धूप मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये पाँव छू उंगली पकड़ फिर सर पे चढ जाती है धूप किस कदर चालाक है ख़ुर्शीद की बेटी भला खिज़ां का इल्ज़ाम रुत के सर पे मढ़ जाती है धूप देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप पद्म 28 585084 77 332936 rate this padmsingh 6 55 pm on march 15 2017 tags hindi 2 मेरा एकांत मेरा एकान्त अक्सर ताने मारता है कि तुम क्या हो और दिखाते क्या हो क्यों नहीं एक बार झटक देते सिर चुका क्यों नहीं देते उधार मान्यताओं का दहकती हुई किसी कविता की आग निचोड़ो नेपथ्य से निकल कर कह डालो अपने संवाद मुक्त करो किसी पत्थर में फंसी मूरत या तूलिका से गढ़ो कोई आकाश जिसमे पंछी सूरज से गलबहियाँ करते हों तुन जिस तरह उस लड़की से विदा ले रहे थे मैं समझ गया था तुम चप्पू भले चलाओ घाट से बंधन नहीं खोल सकोगे उड़ान कितनी ऊँची कर लो चरखी से डोर नहीं खोल सकोगे उछालो न कोई नाद चौताला नोच फेंको मुखौटे वरना जब भी मिलो गे अकेले छोड़ूँगा नहीं जबकि पता ये भी है गोलचक्कर में भागोगे तो कहाँ जाओगे जब भी खुद से लड़ोगे मुँह की खाओगे पद्म सिंह 15 03 2017 28 586270 77 331780 rate this पोस्ट नेविगेशन पुराने पोस्टस पोस्ट की खबर पाएँ ईमेल पर enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email email address sign me up join 5 079 other subscribers grab this headline animator हाल के पोस्ट क्षणिकाएँ जस की तस jas ki tas तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं किट्टू एक खोज क्रान्ति सुनहरा कल लाएगी जीवन और स्मृति हिन्दू समाज को बांटने की राजनीतिक साजिश है सहारनपुर दंगे दिल्ली सोशल मीट 11 4 16 धूप मेरा एकांत झमकोइया मोरे लाल फिर न कहना के हम ने पुकारा नहीं ऊमीद के धागों में वो बाँध गया साँ...
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